अभिसारिके
तेरे कंगन नूपुर की मधुर सुहानी धुन
जिस पर प्रणव नाद गुंजित करता
प्रणय को आतुर मेरा अंतर्मन प्रति क्षण
अभिसारिके
कलकल करती
जल सी बहती तेरी निश्छल काया
अदम्य प्यास तृप्त करती मोहित माया
सरल सुगम था आगमन तुम्हारा
जाने फिर क्यों लौट चली
अधिनायिके
छलने! अब छल मत कर
आकंठ तक तू तृप्त कर
कभी तो चुपके से आ आती
छद्म छली सी एकदम छा जाती
करती तुम एक वार छुप कर
मेरी अभिलाषा सिंचित कर जातीं
कृष्णाभिसारिके
आगत स्वागत का नेह निमंत्रण
विगत दिनो से देता मन
केश विन्यास तू जरा झटका कर
मन को मेरे कुछ भटका कर
ले चल अपने संग प्रिये
वाँछना उठती मेरे हिये
शरद कुमार श्रीवास्तव