मेरे उर मे
तैरता अनंत सा
एक शब्द
अनेक शब्द
भावों मे डूब कर
गति पा चुके
ये एकाकी ही
तैर रहा उर मे
अनुत्तरित
उससे पूछा
मेरे अकथ शब्द
अभी हो यहीं
यक्ष की भाँति
तुम वहीं के वहीं
अनसुने से
मेरे सपने
पानी पे रेखा से
अव्यक्त बने
शरद कुमार श्रीवास्तव
मेरे उर मे
तैरता अनंत सा
एक शब्द
अनेक शब्द
भावों मे डूब कर
गति पा चुके
ये एकाकी ही
तैर रहा उर मे
अनुत्तरित
उससे पूछा
मेरे अकथ शब्द
अभी हो यहीं
यक्ष की भाँति
तुम वहीं के वहीं
अनसुने से
मेरे सपने
पानी पे रेखा से
अव्यक्त बने
शरद कुमार श्रीवास्तव
रश्के मोहब्बत का इजहार रब्बा
तेरे मेरे प्यार का, इश्तेहार रब्बा
गुलों में रंगत खिली खिली सी है
चमन मे और भी हैं कद्दार रब्बा
वफा का इम्तिहान मुझे नहीं देना
जहाँ को इत्मीनान मुझे नही देना
तेरे और मेरे बीच का मामला है
तुम्हे तो है मुझ पर ऐतबार रब्बा
खौफशुदा होकर हम नही झुकते
इश्क और मुश्क छुपाए नही छुपते
कोई रंज मे हो भले या खफा कोई
कैसे दर्शाए भला अपनी वफा कोई
मेरे यकीनो मे रब का गुमा होता है
घूप मे सुन्दर शब का गुमा होता है
एकाकी रात हो कि बेहद तन्हाई
पास है तू, सुकूं का गुमा होता है
शरद कुमार श्रीवास्तव
वक़्त के साथ निशा सुन्दरी तेरा रूप निखरता जा रहा है
अधखुले नेत्र- मदिरालय मे आतुर मन लपकता आ रहा है
ढल रहा है चाँद क्षितिज मे चाँदनी मद्धिम होती जा रही है
बालिका सी सो रही जिन्दगी की लौ धीमी होती जा रही है
निर्धारित है ये नियत प्रणय, आलिंगन का है ये पल रूपसी
घनपाश मे आ पकड़ जकड मिटे हृदय शूल की बेकसी
जो भी है यह पल है केवल, स्वर्णिम क्षण, सिमटा जा रहा
प्रज्वलित लौ हे दीपशिखा की, दीप क्षण मे बुझने जा रहा
चकित भ्रमित मत कर मुझको देवालय के सब दीप बुझे
न कोई अर्जी मर्जी की चलने वाली क॔ठस्वर भी हुए रुंधे
खोल जरा अवगुंठन अब तू, दूरी को अब मिट जाने दे
प्यासा कंठ तृप्त जरा कर चिरप्यास जरा मिट जाने दे
शरद कुमार श्रीवास्तव
अभिसारिके
तेरे कंगन नूपुर की मधुर सुहानी धुन
जिस पर प्रणव नाद गुंजित करता
प्रणय को आतुर मेरा अंतर्मन प्रति क्षण
अभिसारिके
कलकल करती
जल सी बहती तेरी निश्छल काया
अदम्य प्यास तृप्त करती मोहित माया
सरल सुगम था आगमन तुम्हारा
जाने फिर क्यों लौट चली
अधिनायिके
छलने! अब छल मत कर
आकंठ तक तू तृप्त कर
कभी तो चुपके से आ आती
छद्म छली सी एकदम छा जाती
करती तुम एक वार छुप कर
मेरी अभिलाषा सिंचित कर जातीं
कृष्णाभिसारिके
आगत स्वागत का नेह निमंत्रण
विगत दिनो से देता मन
केश विन्यास तू जरा झटका कर
मन को मेरे कुछ भटका कर
ले चल अपने संग प्रिये
वाँछना उठती मेरे हिये
शरद कुमार श्रीवास्तव
मुद्दतें लग गईं उन्हें मनाने मे
कहाँ रह गए किस जमाने मे
मोहब्बतें कम न होती उनसे
बढ़ी है खलिश हर फसाने मे
बामुश्किल काबू किया दिल
बेकरारी मे सराबोर था दिल
नामुमकिन था भूलना उनको
हुआ नाशाद यह हमारा दिल
इस कदर मारा है बेवफाई ने
झकझोर दिया तेरे फसाने ने
उम्रदराज इश्किया अफसाना
बुतां इबादत का टकरा जाना
खैर जो होना है अब हो जाय
खुदाए इश्क रहबर हो जाए
दो रोज मयस्सर हैं शायद
इश्के- रब सराबोर हो जाए
शरद कुमार श्रीवास्तव