सोमवार, 1 नवंबर 2021

अव्यक्त स्वप्न

 


मेरे उर मे 

तैरता  अनंत सा

एक शब्द 


अनेक शब्द 

भावों मे डूब कर

गति पा चुके 



ये  एकाकी ही

तैर रहा उर मे

अनुत्तरित 

 

उससे पूछा

मेरे अकथ शब्द

अभी हो यहीं

 

यक्ष की भाँति 

तुम वहीं के वहीं

अनसुने से

 

मेरे सपने

पानी पे रेखा से

 अव्यक्त बने


शरद कुमार श्रीवास्तव 






सोमवार, 4 अक्टूबर 2021

यकीनो मे रब

 



रश्के मोहब्बत का  इजहार रब्बा

तेरे मेरे प्यार का, इश्तेहार  रब्बा

गुलों में रंगत खिली खिली सी है

चमन मे और भी हैं कद्दार रब्बा


वफा का इम्तिहान मुझे नहीं देना

जहाँ को इत्मीनान मुझे नही देना

 तेरे और मेरे बीच का मामला है

तुम्हे तो है मुझ पर ऐतबार  रब्बा

 


खौफशुदा होकर हम नही झुकते

इश्क और मुश्क छुपाए नही छुपते

कोई रंज मे हो भले या खफा कोई 

कैसे दर्शाए भला अपनी वफा कोई


मेरे यकीनो मे रब का गुमा होता है

घूप मे सुन्दर शब का गुमा होता  है

एकाकी रात हो कि बेहद तन्हाई

पास है तू, सुकूं का गुमा  होता है


शरद कुमार श्रीवास्तव 






शनिवार, 2 अक्टूबर 2021

निशा-सुन्दरी

वक़्त के साथ निशा सुन्दरी तेरा रूप निखरता जा रहा है

अधखुले नेत्र- मदिरालय मे आतुर मन लपकता आ रहा है

ढल रहा है चाँद क्षितिज मे चाँदनी मद्धिम होती जा रही है

बालिका सी सो रही जिन्दगी की लौ धीमी  होती जा रही है


निर्धारित है ये नियत प्रणय, आलिंगन का है ये पल रूपसी

घनपाश मे आ पकड़ जकड मिटे हृदय शूल की बेकसी

जो भी है यह पल है केवल, स्वर्णिम क्षण, सिमटा जा रहा

प्रज्वलित लौ हे दीपशिखा की, दीप क्षण मे बुझने जा रहा


चकित  भ्रमित मत कर मुझको देवालय के सब दीप बुझे

न कोई अर्जी मर्जी की चलने वाली क॔ठस्वर भी हुए रुंधे

खोल  जरा अवगुंठन अब तू, दूरी को अब मिट जाने दे

प्यासा कंठ तृप्त  जरा कर चिरप्यास जरा मिट जाने दे



शरद कुमार श्रीवास्तव 

 


शुक्रवार, 24 सितंबर 2021

अभिसारिका

 


अभिसारिके

तेरे कंगन नूपुर की मधुर सुहानी धुन 

जिस पर प्रणव नाद गुंजित करता

प्रणय को आतुर मेरा अंतर्मन प्रति क्षण


अभिसारिके

कलकल करती

जल सी बहती तेरी निश्छल काया

अदम्य प्यास तृप्त करती मोहित माया

सरल सुगम था आगमन  तुम्हारा

जाने फिर  क्यों लौट चली


अधिनायिके

छलने! अब छल मत कर

आकंठ तक तू तृप्त कर

कभी तो  चुपके से आ आती

छद्म छली सी एकदम छा जाती

करती  तुम एक वार छुप  कर

मेरी अभिलाषा सिंचित कर जातीं


कृष्णाभिसारिके 


आगत स्वागत  का नेह निमंत्रण 

विगत दिनो से देता मन

केश विन्यास तू जरा झटका कर

मन को मेरे कुछ भटका कर

ले चल अपने संग प्रिये

वाँछना उठती मेरे हिये



शरद कुमार श्रीवास्तव 










शनिवार, 17 जुलाई 2021

करोना से जंग




खिड़की खुली रखना आएंगी  हवाएं 
सासें तुम्हारी तुुम्हे दे जाएंंगी दुआएं
अंतस् को जरूरी खुशनुमा  फिजाएं
ताजा प्राणदायनी शुद्ध साफ हवाएँ

मास्क बनाएगा सांसो पर कड़ा पहरा
करोना का  आतंक अभी तक है ठहरा
नाच रही हैं बेखौफ जालिम की सदाएं 
ख्यालो मे पसरी कल की गन्दी  हवाएं  

लम्बी जंग लड़ा, कर कुछ और शगल
कुछ देर ठहर जा कुछ  तू और संभल
तीसरी शय से लड़ने की है सब तैयारी
हमने वैक्सीनो की पूरी फौज है उतारी


कोरोना अब हारेगा इन्ही तदबीरों से
लडाई छिड गई काम नहीं तकदीरों से
जंग छिड़ ही गई है बस आगे बढो ना
जीत तुम्हारी  होगी  तुुम और डरो ना


शरद कुमार श्रीवास्तव 
















गुरुवार, 15 जुलाई 2021

इश्के -रब

 मुद्दतें लग गईं उन्हें मनाने मे

कहाँ रह गए किस जमाने मे

मोहब्बतें कम न होती उनसे 

बढ़ी है खलिश हर फसाने मे


बामुश्किल काबू किया दिल 

बेकरारी मे सराबोर था दिल

नामुमकिन था भूलना उनको

हुआ नाशाद यह हमारा दिल


इस कदर मारा है बेवफाई ने

झकझोर दिया तेरे फसाने ने 

उम्रदराज इश्किया अफसाना

बुतां इबादत  का टकरा जाना

 

खैर जो होना है अब हो जाय

खुदाए इश्क रहबर हो जाए 

दो रोज  मयस्सर हैं शायद

इश्के- रब सराबोर हो जाए



शरद कुमार श्रीवास्तव 


मंगलवार, 13 जुलाई 2021

आषाढ मास

अभी तो चमन मुर्झाए हुए हैं
 विटप सूने से  झुलसाए हुए हैं
फूल तरु पर खिलते नहीं हैं
विहगदल भी मिलते नहीं है

अरुणिमा तप्त है बीमार है
आषाढ़ की ये भिनसार है
सप्तहय झूझते है सुबह से
संहार की मंशा हो अभी से

पर पथिक राह मे है न अकेला
क्षुधा की आग को सबने झेला 
भूख की परिधि व्यापक बड़ी है
तप्तनभ मे और  तनके खड़ी है


श्रमिक वणिज वित्त या किसान
गर्मी लेती है सबका  इम्तिहान
 सिक्कों की चमक ही है ऐसी
चलते रहते पंखे कूलर व ए सी

श्वेत मेघ-दल आते चले जाते हैं
धरती की प्यास  बढ़ा जाते हैं
जा रहे हैं सागर से ये गागर भरने
श्रावण मे झरने लगेंगे नीर झरने

आश्वस्त  हो ग्रीष्म-पीड़ा घटेगी
तप्तनभ के आक्रोश को रहेगी 
वारिद की फुहार खेतों मे पडेगी
नई आशाओं से धरती खिलेगी


शरद कुमार श्रीवास्तव