सोमवार, 27 फ़रवरी 2017




2 मार्च 2014 को वीनापति मे प्रकाशित मेरी रचना 

रात      

 ( हाइकु लेखन शैली मे 17 वर्णों की माला मे रचित)

रात आती है
सुबह आने तक
रुक जाती है

मै चाहता हूँ
कभी रात नहीं हो
सुबह ही हो

ठंडी शीतल
केवल सुबह हो
अविरल हो

मन्द बयार
ताज़ी निर्मल धूप
खुशहाल सी

तुमने देखा
रात ठहर गई
एक भय से

मेरी इच्छित
कामनाओं से डर
इसे लगता

ये बात है तो
पूरी रात जागूँगा
स्पर्धा में ही

अच्छा ही होता
रात आती ही नहीं
किसी के पास

दीर्घ स्थायी
विरहाकुल काली
बदनुमा सी

शरद कुमार श्रीवास्तव

सोमवार, 20 फ़रवरी 2017




वीनापति मे 18 फरवरी 2014 को प्रकाशित मेरी एक रचना

फरियाद

गये कहाँ हो छोड़कर मुझे कुछ पता नहीं
भटक रहा डगर मगर तेरा कुछ पता नहीं
बाल-पन में आये तुम, रहे सदा छाये तुम
दूध की कटोरी में, माता की लोरी में तुम 
खिलोने में दिखे सदा, चाँद से सलोने तुम
बालकथा में छाये थे, हर जगह समाये तुम
ढूंढता हूँ भटक रहा जाने कहाँ गये हो तुम
फिर रहा इधर उधर तेरा कुछ पता नहीं

गये कहाँ हो छोड़कर  मुझे कुछ पता नहीं
भटक रहा डगर मगर तेरा कुछ पता नहीं
जवानी जब आयी तो मस्ती रही छाई जो
दिल में इक उफान था जोश था तूफ़ान था
सवाल ही सवाल था तुम्हारा ना ख़याल था
नशा रहा ज़रा ज़रा तुमसे हांथ लिया छुड़ा
जाने मैं किधर गया तुम्हारा कुछ पता नहीं
भटक रहा डगर मगर तेरा कुछ पता नहीं

तूने मुझे बताया था कभी गले लगाया था
याद करोगे आऊंगा, प्यार तुझे जताऊंगा
राह में मैं पड़ा हुआ याद तुम्हे ही कर रहा
करूं अब  क्या भला जाने तू किधर गया
फेंट बिसरी यादो को समेटकर फरियादों को
भूले हुए सब वादों को बटोर सारी बातों को
गुबार तो निकाल दूं  एक ख़त मैं डाल  दूं
पर क्या तेरा नाम दूं किस पते पे डाल दूं

शरद कुमार श्रीवास्तव