शनिवार, 21 अक्टूबर 2017

राजू जीवन एक सफर पर प्रतिक्रियाएं




नमन आदरणीय 🙏😊
सर्वप्रथम क्षमा चाहूँगी बहुत समय बाद मैंने आपका उपन्यास *राजू  जीवन एक सफर* पढ़ी। कुछ घरेलू कारण कुछ पहले से ही एक दो उपन्यास शुरू किए हुए उन्हें पूरा करना था इसी कारण देर हुई 🙏* राजू जीवन एक सफर* एक ऐसा उपन्यास है जो शुरू करने के बाद खत्म किये बिना छोड़ने का जी नही हुआ। ऐसा काफी समय बाद हुआ है कि किसी उपन्यास को एक साँस में पढ़ती चली गई । हालांकि इसमें शब्दो की कोई जादूगरी नही सरल सहज शब्दो मे लिखी गयी एक कहानी एक निम्न आय वर्ग के बच्चे के जुझारू जीवन की कहानी बिना लाग लपेट सहज अभिव्यक्ति फिर भी  पाठक को अंत तक बांधे रखने में सक्षम है । अंत तक जिज्ञासा चरम पर रही आगे क्या होगा। केवल निम्न आय वर्ग की कठिनाईयो को ही नही उग्रवाद जैसे विषय को काफी तर्कपूर्ण तरीके स्व दर्शाया गया है इसमें । सच ही है जितनी विषम  परिस्थिति यो से गुजरने के बाद भी नायक का जो सशक्त चरित्र उभर कर सामने आता है वो प्रेरणा का काम करता है । इस उपन्यास के लिए हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाये ☺,🙏

नेह सुनीता







...
प्रणाम बाबूजी !
वैसे तो कहानी , उपन्यास पढ़ना सर्विसेस में व्यस्तता के कारण बहुत कम हो गया था । बहुत दिनों बाद आपका उपन्यास #राजू_जीवन_एक_सफर " पढ़ने को मिला ।
उपन्यास को पढ़ने के दौरान यह महसूस होता गया कि इसमें जीवन के मार्मिक , संघर्ष , जीवटता और सम्वेदनशीलता को विषय में बड़ी ही रोचकता से प्रस्तुत हुआ है , जो पाठक को बांधे रखती है ।  विषय समसामयिक और गम्भीर है लेकिन बहुत ही सरल शब्दों और छोटे- छोटे शब्दों से स्पष्ट किया है ... पढ़ने के दौरान अपनी पृष्टभूमि जैसा ही महसूस हुआ ।
.
राजू , सरला , मन्नू , मौसाजी , सावित्री , लल्ली , शर्माजी , रमन , मीरा , रमेश ,कृपानिधि पाण्डेय , हलदर साहब , माधुरी , विमला और अंत में महत्वपूर्ण चरित्र शोभा सभी शानदार पात्र है ... बहुत ही जीवन्त पात्र रचना है आपके । साथ ही सभी परस्पर सकारात्मकता [ positivity ] के साथ अपने चरित्र के साथ न्याय करते है ।
.
राजू की कहानी एक निम्न मध्यम वर्गीय बच्चे की संघर्ष की कहानी है , जो बचपन में मानसिक और शैक्षणिक समस्याओं को जूझता हुआ अपने आत्मबल और कड़ी परिश्रम से जीवन में आगे बढ़ता है । ईमानदारी और उत्तरदायित्व की भावना से एक सार्थक लक्ष्य को प्राप्त करता है । परिस्थियों से जबरदस्त तरीके से सामन्जस्य बिठाना काबिले तारीफ है ।
.
उपन्यास में ग्रामीण- शहरी सन्तुलन , सामन्जस्य का बड़ा सूक्ष्म वर्णन, उग्रवाद जैसे ज्वलन्त मुद्दों को भी उकेरा है ।
सरला और सावित्री जैसी सशक्त , मातृभाव , जीवटता वाली चरित्र ने नारी के महत्वपूर्ण गुणों को प्रभावी चित्रण हुआ है ।
.
सावित्री का ममत्त्व , राजू का कठोर परिश्रमी , निष्ठावादी , शोभा का आंतरिक संघर्ष , मौसा जी , रमन का सहयोगी भावना , मीरा का अपनत्व  बहुत ही सुंदर और मर्मशील तत्व है जो उपन्यास को सरस और रोचक बनाते है ।💖💞
.
#राजू : जीवन का सफर " ... पढ़कर जीवन के प्रति कुछ बिन्दुओ पर दृष्टिकोण में सकारात्मक परिवर्तन महसूस हुआ । पूरा उपन्यास सकारात्मकता [ positivity ] से भरा है , जो मन में सुकून के भाव जगाते है । 👌
...
बहुत आनन्द और सुकून मिला इस रचना को पढ़कर ।
धन्यवाद आपका !
यू ही अपने विचारो को निरन्तर गतिशील रखिये ताकि आपके अनुभवो से हमे भी राह , मार्गदर्शन और प्रेरणा मिले बाबा ।
सादर प्रणाम बाबूजी । 👏👏
....
KK वर्मा , रायपुर 😊
~~~~~~


 मेरी एक अवधी रचना

निर्गुन

संझा के बादे अंधेरिया, अब का करिबे बाबू

खाली  है हमरी ढिबरिया हम का करिबे बाबू

समय काल रहत, सब सुध बुध हम गंवायेन

बंद भई सारी बजरिया , अब का करिबे बाबू



संझा के बादे अंधेरिया, हम का करिबे बाबू

तार तार  हमरी चुनरिया, हम का ओढबै  बाबू

बिन ओढे चुनरिया सब किरुआ हमका कटिहैं

ओढके राम-नामी चदरिया, हम सो जइबे बाबू

शरद कुमार  श्रीवास्तव

बुधवार, 18 अक्टूबर 2017

एक प्रेम गीत




तुम  ही  मेरी शायरी तुम  ही गीत  गजल  हो
तुम  ही मेरी मीत भी तुम  ही प्यार  अचल हो
तुम ही मेरे सुरों  मे सजीं मेरी  रागनी सरल हो
दिल पे  तेरा  राज है जादूगरनी रूप विमल हो

मेरी अराधना  तुम्ही से है  पूजा अविरल हो
तेरी रंजिश मुझे सहन नहीं जैसे तेज गरल हो
तुम  ही  मेरी शायरी तुम  ही गीत  गजल  हो
तुम  ही मेरी मीत भी तुम  ही प्यार  अचल हो

शरद कुमार  श्रीवास्तव




बुधवार, 11 अक्टूबर 2017

आनंद के पल



आनंद  के पल

उडने को है तैयार  परिन्दे

कुछ हँस  ले  कुछ  गा ले

चार पल  आनन्द मना ले

सुर सजा और गीत गा ले

माना हम अब है शाम ढली

राह कठिन अंधियारी गली

क्यों चिन्ता करता है परिन्दे

क्यों निराशा तेरे मन में पली


डाल पे  बैठकर सुर मिलाले

कुछ  हँस  कर  कुछ  गा ले

हर पल बस आनंद  मना ले

जीवन  का हर आनंद उठा ले

पहले थे दिन रात मनोहर

खट्टे मीठे रसदार मनोहर

उन्हें  याद करके  तू पंछी

निज चैन, मत- हर मत- हर

आयगी अब रात मनोहर

शीतल चांद यामिनी सुन्दर

मृदु राग घोलती अंबर पर

आ जा सुर मे सुर मिलाले

समय की लडी के  मोती

चुन नव स्वप्न  सजा  ले

चिंताओं  से बाहर  होकर

जीवन का  आनंद  मना ले

शरद  कुमार  श्रीवास्तव








शुक्रवार, 6 अक्टूबर 2017

दीदार



समायी  रहती है तू मेरे  खयालों  मे, तेरे जलवों  की  बात होती  है
दिखाई  देती नहीं मुझको  फिर भी  , बन्द आखों मे  पास होती है।

 तुम तो  रहती हो मेरे  खयालों  मे, तेरे जलवों  की  बात होती  है खलिश मे जलता रहा उम्र भर यूं ही अब रिहाई की  बात होतीं  है

कोई  कब तक  जलेगा और तपिश मे भला तेरी  मोहब्बत के  लिए
 जख्मों पर रखने के  लिए तेरी नजर के एक फाहे  की बात होती  है

इबादत  नही है कोई जरिया कोई इल्म नही है  मुझे अब  इश्किया
झुकी जाती  है शर्म से नजरें , दीदारे- यार  मेरे दिल के पास होतीं है

शरद कुमार  श्रीवास्तव