मंगलवार, 16 दिसंबर 2025

यादों का सिलसिला

यादों के मेरे इस शहर मे एक घर सिर्फ तेरा ही है।
मेरी दास्ताने इश्क मे चर्चा भी सिर्फ तेरा ही है ।।
कोई आये या न आए इस वीरान पड़े गुलशन मे  
ठूठों मे भला कोई गुल क्या कभी परचम होगा ।।

बात यादों की नहीं है न उनकी बारात का जिक्र 
ख्याल खुद- ब खुद  सिलसिलेवार चले आते हैं।।
जैसे कल ही की बात हो या अभी बीते पल की
तसव्वुर फुसलाकर ले जाते हैं भूले सुहाने मंजर।।

ऐहसास पसरी हुई तन्हाई  का न होता मुझको
काली स्याह रातें ही जुल्फों मे भर लेती मुझको ।।
फिक्र  करना नहीं कभी न मेरा जिक्र ही करना
रेत के टीले कभी सब्ज बाग संजो पाये हैं भला।।

शरद कुमार श्रीवास्तव

मंगलवार, 4 मार्च 2025

लक्ष्य भेद

 लक्ष्य को भेदित नित

दैनिक अभ्यास 

इच्छा, नई ऊंचाइंया ।

नया परिसीमन 

नया लक्ष्य फिर  बोरियत  

असीमित,   अलक्षित ।।

घर के कमरों 

की सीमांत  लकीरें

पसरी अजगर सी। 

इधर से उधर

उधर  से इधर

इसी परिसीमन मे ।

किसने खींचीं है 

लकीरें अभेद्य 

लक्ष्मण  रेखा ।।

और मेरा भी   

बाहर निकलने का

न इरादा न विचार ।

मन मे सिमटा भयानक 

आवारा पशुओं सा भय

और सामने ढलती  जिन्दगी ।।


शरद कुमार श्रीवास्तव 

 


शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2025

बसन्त के स्वागत मे

 


अलि तुम आली से कहना अब बसन्त आने को है

चहकने लगी हैं कलियाँ  भ्रमर दल लहराने को है

हवा मे अब गुलाबी ठंड , फिजा भी मस्त  मस्त है।

पीली सरसों की खुश्बुओं से मौसम लब्ध लस्त है ।।


तरु पर नूतन किसलय नई कोपलें फूटने को हैं

शिशिर के अति आतंक से जगत अब छूटने को है

पर्वत  पिघलने लगे शिखर नदियों का कलकल मनोहर है

धरती भर मे गूंजता आसन्न चैती का सुन्दर  सोहर है ।।



ऋतुराज आने के आगाज से, जामुन आम बौराया

तितलियों मवरों के दलों ने आगमन का प्रीतराग गाया

इधर हाला उधर टेसू पलाश  होली का  रंग मदमाता

लगा अब कोयल पिक पक्षीजन स्वागत  गीत  स्वर मे गाता ।।

शरद कुमार श्रीवास्तव 

बुधवार, 15 जनवरी 2025

अपना ये रंजोगम सारी परेशानी मुझे देदो

ना आँखें नम करना, ना रोना बिलखना

बड़े सब्र से तब तुम मुझे याद  रखना

शबे- फुरकत तक जब नहीं हो सकता मिलना

इन आंसुओ को अब न जरा खर्च करना


मयस्सर  ही होना है हमारा बस मिलना

बड़े सब्र से अब तुम जरा धैर्य  रखना

फलक तलक रोकेगीं क्या जुल्मी हवाएं

बहुत जुल्म  ढाएंगी जो बेवफा फिजाएं


फुरसत से फिर अपनी मुलाकात होगी

रंजोगम पर फिर फुरसत से बात होगी

चाँद तारों की महफिल सजे तेरी खातिर

कयामत मे, ऐसी हमारी तैयारी रहेगी।। 


शरद कुमार  श्रीवास्तव 

हौंसले

 चलो तरन्नुम मे नया गीत गायें

हौसले भरे कहकहे हम लगाएं

इन्द्रधनुषी हों मधुर सपने हमारे

जहाँ निहारे हों सितारे ही सितारे


धुनों का बुन सुन्दर सा वो तराना

जुनून-ए-परिस्तिश का अफसाना

जोश भर पत्थर हवा मे तो उछाले

अलक से फलक  एक कर डाले


शरारे इश्क छेड़ रगों मे ले सरगम

मुशाहरा मे गुम दिल की धड़कन

जुस्तजू दिल से हो, बन्दिश न भरम

जिद्दोजहद हो पूरी बाकी उसका करम




शरद कुमार  श्रीवास्तव 



परिस्तिश =पूजा, आराधना,