बुधवार, 21 अक्टूबर 2020

कण-कण में है भगवान्




कण-कण में है भगवान्  बात तुम हमरी मानो
मेरी भला क्या औकात आप भी खुद संधानो
घूम रहे थे इधर उधर अधर्म का झंडा फहराते
कहाँ कहाँ से कैसे कैसे छद्म रूप लिये बनाते

हर प्राणी है अधम, न मानेे वह ईश्वर को शक्ति 
लोभ माया मे फंसा भूला वह प्रभु की ही भक्ति 
करता रहा कुकर्म  अपनी मौजमस्ती मे खोया 
आयी जब आफत सर पे बुक्का फाड़ वो रोया

शरद कुमार श्रीवास्तव 












रविवार, 18 अक्टूबर 2020

अवगुंठन अब खोल प्रिये निर्बाध निरंतर मिलें हिए




अवगुंठन अब खोल प्रिये

निर्बाध निरंतर मिलें हिए


सप्तपदी हो चुकी हमारी

कुछ नहीं दूरी अब रहे हिए

नूपुर की धुन हुई है मद्धिम 

कंकण भी अब खोल प्रिये 


लौ दीपक की हुई है मद्धिम 

गहन तिमिर रात्रि अवरोहित

अपने साजन संग डोल प्रिये

सासें सांसों संग घोल प्रिये


गायन हो तन मन के अंदर 

घुलें मिलें मन मस्त सचेतन 

तब होए मधुरात्रि मनोहर 

जब होए कल्लोल सुमधुर 


अवगुंठन अब खोल प्रिये

निर्बाध निरंतर मिलें हिए

जब तक हैं तन में सासें

प्रभु को नहीं छोड़ प्रिये







बुधवार, 19 अगस्त 2020

बेड़ियाँ



बन्द थे दरवाजे उस दिन वो अमावस की रात थी
संक्रमण के अचानक फैलने वाली की वो बात थी 
हर गली हर मोड़ पर पसरा हुआ था घना सन्नाटा 
हर शक्स था सहमा सामने भविष्य था अज्ञात सा

बीते काल  के खम्बे शहतीरें कहते हैं ये कहानी
पहले भी खौफ़ झेलने की फैलती थी यही रवानी
चेचक कभी हैजा तो प्लेग से तंग थी जिंदगानी
मौज मे कभी नहीं रह पायी किसी की कहानी 

कम थीं जरूरतें मगर सबके शौक होते थे पूरे
कभी-कभी किसी के सपने भले रहते हों अधूरे 
भरोसा रख नियति पर बदलेंगे दिन जल्द सारे
करोना विषाणु है जैसे बाकी हैंऔर  विषाणु सारे


बात फकत मेरे अपने सब हैं मेरे खैरख्वाह
स्वाद पर अंकुश है कुछ आदतन लापरवाह
कुछ दूर मे दिख रही मंजिल पर तंग हैं राहें
चलना बा-मुश्किल राह जोहती बेसब्र निगाहें


उस पार से मेरे यार ने भेजा है ये पैगाम
अब तो बड़ी देर हो गई तकते सुबोशाम
प्यार बेबस और कुछ मै कर नहीं सकता
पलक भर तारों को देख बेबस मैं तकता

करने हैं यहाँ पर बाकी हैं बहुत अभी काम
वही रोक लेते हैं बेसब्री से नहीं हूँ अनजान
मुझे है यकीं फलक पे चांद निकलेगा कभी
इस खौफ़ इस डर से छुटकारा मिलेगा कभी


शरद कुमार श्रीवास्तव







शनिवार, 6 जून 2020

संवेदनाएं




मृत हैं सब संवेदनाएं
धमनियां रिसती नहीं
अबला की चीखें अब
दुनिया ये सुनती नहीं

कठपुतली सब हैं यहाँ
रहता नहीं इन्सान है
चाभियों की संतान ये
यन्त्र सम पहचान  है

क्रूरता करता है मानव
कुटिल हर्ष को जानता
कि बीमा से धन मिलेगा
निरीह कुंजरों को मारता

थी बेचारी गर्भवती वह
पेट में भ्रूण था पल रहा
उसे न था मालूम पापी
के मन मे क्या चल रहा

मौत लाया छल से वह
भर अनन्नास मे पटाखा
हथिनी को जबरन दिया
हर्षित हुआ कर धमाका

मुंह में जब फूटे पटाखे
तड़प पानी में कूदी वो
बचा न पाई स्वयं न ही
अजन्मी सन्तान ही को

दुष्टता की थी पराकाष्ठा
दुष्कर्म जन में पल रहा
हाय हर ओर ये हो रहा
तमाशा इंसा है जल रहा

धर्म के नाम पर ये दरिंदे
देश में देखो मर कट रहे
विश्व के पटल पे हैं लोग
दिनोंदिन तरक्की कर रहे


शरद कुमार श्रीवास्तव



रविवार, 31 मई 2020





कोरोना को ललकार

घर में झरोखों से भी दूर है
एक अन्तहीन पसरा सन्नाटा
इसी मे तुझसे भिड़ने
यह बिसात मैंने
खुद ही बिछाई है


अकेलेपन के स्वाद
को खूब चखा है मैंने
सबके बीच एकाकी
रह कर
अनुभव किया है इस
सुख को----


आखिर कैलाश में
एकांत वास मे लिप्त
भगवान शिव भी
एकाकीपन के स्वर
को पहचानते हैं

गहरे गभीर समुद्र
के मध्य एकांत की
अनंत लय मे लीन
भगवान विष्णु भी
लहरों मे अविचल हैं
आत्मविभोर

हमारा एकांतवास
है कोरोना को ललकार
बाहर वह भीतर हम
जब तक हम घर में
तब तक संपूर्ण सुरक्षित



शरद कुमार श्रीवास्तव



रविवार, 29 मार्च 2020

तुमको पैगाम



कोशिशों बाद न बिसरी तमाम  बातें
तुम्हारे इन्तजार में सूनी तमाम रातें
रातों ने बिछाई शतरंज की बिसातें
जीत लीं मुझसे वो नींद की सौगातें

छेड़ता हूँ तसव्वुर का तार जब शब
उनींदा ख्वाब के स्वर इठलाते हैं तब
स्याह सी बदनुमा लकीर खींच कर
दिल के गुलशन में खार बो जाते हैं


मुद्दतों बाद जब सोने की बारी आई है
सर्द पड़ी चादर मौसम की रुसवाई है
इल्तिजा तुमसे तन्हाइयों रुखसत न होना
तुमसे आबाद अब इस दिल का हर कोना

बड़ी तरतीब बड़ी शिद्दत से संजोया इसको
खुशनुमा यादों की माला मे पिरोया इसको
जिसे कहते हैं पैगाम तुझ तलक भेज पाता
झिलमिल सितारो मे पता गर चे मिल जाता


शरद  कुमार  श्रीवास्तव

महालय के सुर



आज फिर नया गीत गुनगुनाओ
नये सुरों के साथ परचम लहराओ
शाम से रागिनी गा रही है तराना
हो सके इधर जरा तुम आ जाना

हवाओं की खुशबू तुम्हारे लिये है
हमारी जुस्तजू बस तुम्हारे लिये है
अखियोंं का कजरा तुम्हारे लिये है
वस्त्र श्रृंगार सब ये तुम्हारे लिए है


तेरे  लिये  रची जा रही है कहानी
वयइति संधि की है सुन्दर जवानी
कलम की नोक बनी है सेन्दुरदानी
वरमाल संग आ महालय की रानी


शरद कुमार श्रीवास्तव





शनिवार, 28 मार्च 2020

मेरी ताजातरीन रचना विक्षोभ



बोलो बोलो हे कंत आया कैसा यह बसंत
विक्षोभ भरा मन मे खुशियों का हुआ अंत
शीत खत्म हुआ बीते शिशिर शरद हेमंत
तुम्हारे बिन हे कंत कैसा लगता ये बसंत

पुष्पों संग अनंग आए हैं संग तुम नहीं आये
फिजा में छाई है मस्ती, सभी पेड़ हैं बौराए
जवाँ हुईं कलियाँ कोकिल की कूक भी आई
हमे घरों में बंद रहना यह कैसी है ऋतु आई

बोलो बोलो हे कंत आया कैसा यह बसंत
विक्षोभ भरा मन मे खुशियों का हुआ अंत
तुम्हारे बिन हे कंत कैसा लगता ये बसंत

चाहत थी हमारी तुम्हारे साथ साथ हम चलते
कभी कहते अपनी बीती  कुछ मेरी सुन जाते
इस कहने सुनने में रातो- दिन साथ कट जाते
न आता कोरोना का खौफ तो जरूर तुम आते

बोलो बोलो हे कंत आया कैसा यह बसंत
विक्षोभ भरा मन मे खुशियों का हुआ अंत
तुम्हारे बिन हे कंत कैसा लगता ये बसंत

शरद कुमार श्रीवास्तव

सोमवार, 20 जनवरी 2020



तुम जो मिले, तो मिली मंजिल
तुमसे ही रोशन हुई हर महफिल
तुम्हारे रहने से रौशन थीं दिशाएँ
अब सूझता नहीं हम किधर जाएं

बहके बहके से फिजा के इशारे थे
दूर रहकर भी बेशक तुम हमारे थे
रहते हरपल कभी जान से प्यारे थे
खुशनुमा बाग के हसीन नजारे थे


यह सच है कि मंजिलें और भी हैं
जीने मरने के ठिकाने और भी हैं
सच है प्यार ही सब कुछ नहीं है
उसके सिवा और कुछ भी नहीं है


ये नेमत हर नेमत से बड़ी होती है
नहीं तो दिलों में दरार पड़ी होती है
हर सोंच गर प्यार पर सिमट जाए
सच मानो सारे फसाद मिट जाय

शरद कुमार श्रीवास्तव