कोरोना को ललकार
घर में झरोखों से भी दूर है
एक अन्तहीन पसरा सन्नाटा
इसी मे तुझसे भिड़ने
यह बिसात मैंने
खुद ही बिछाई है
अकेलेपन के स्वाद
को खूब चखा है मैंने
सबके बीच एकाकी
रह कर
अनुभव किया है इस
सुख को----
आखिर कैलाश में
एकांत वास मे लिप्त
भगवान शिव भी
एकाकीपन के स्वर
को पहचानते हैं
गहरे गभीर समुद्र
के मध्य एकांत की
अनंत लय मे लीन
भगवान विष्णु भी
लहरों मे अविचल हैं
आत्मविभोर
हमारा एकांतवास
है कोरोना को ललकार
बाहर वह भीतर हम
जब तक हम घर में
तब तक संपूर्ण सुरक्षित
शरद कुमार श्रीवास्तव
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