रविवार, 2 जून 2024

दो जून की रोटियाँ


 नक्शा कभी गोल,टेढ़ी मेढ़ी रोटियाँ

बमुश्किल बनती दो जून की रोटियाँ

पेट भरने के लिए  जरूरी हैं रोटियाँ

जिन्दगी संग लिए दो जून की रोटियाँ


राम की माला या ज्ञानियों की शाला

प्रणब नाद पर भी जरूरी हैं रोटियाँ

भरे पेट मे देखा? सिसकते बिलखते

जाचक तो निहोरे दो जून  की रोटियाँ


बड़े दूर से आई है रोटी की कहानी

भरे पेट तब बने वो मुल्ला और ध्यानी 

गंगा का जल हो या जमजम का पानी  

छिपी है वहीं दो जून रोटियों की कहानी 



शरद कुमार  श्रीवास्तव 


शनिवार, 1 जून 2024

बिसरती यादें

 सुहाना सा सफर है और यादें

बहारों का असर है और यादें

इधर आच्छादित टिकोमा चम्पा

उधर रातरानी सुगंध समेटे यादें।।


प्यारे नगमे समेटे दिलचस्प यादें

अनुपम अनुराग बटोरे मधुर यादें

शिशुओं संग आल्हादित सफर ये

बिखरती सिमटती दूर जाती यादें


भला क्यों समेटें धुंधली सी बाहे

नवोदय पर गुम हो जायेंगी राहे

बचा है सफर जो करना है सुहाना

यादों बस तुम मेरी यादों मे न आना


शरद कुमार श्रीवास्तव 

  

बुधवार, 22 मई 2024

राब्ताए इश्क: कुछ अश-आर

 फरियाद की न हमने दर्द की, तुमसे न कोई किया  गिला ।

 मेरी कशिश बरकरार रही राब्ताए इश्क का न सिला मिला ।।

वो जख्म जो कल तक थे हरे, नासूर पुराने बन गए ।

न फिक्र थी मेरे दर्द की, उन्हे मरहम करे  उन्हे सिये ।।

 

बन्दगी दुआ तेरी जुस्तजू, तर्ज ए इश्क पर मै किये चला ।

लोगो ने निगाह मोड ली कोई इधर चला या उधर चला ।।

फलक तक पड़ी मेरी नज़र, हर सूं रब दिखे जुदा  जुदा ।

कशिश थी जिसके दीदार की वह दिखा नहीं  मेरा खुदा ।।


तपिश  शरारों की न हुई दफन , खलिश बदस्तूर ,  बिला कफन ।

मेरा इश्क है तेरी जुस्तजू , तेरी आरजू तेरी लगन ।।

हर शक्स मे तस्वीर ढूँढता फिर रहा यार की ।

जिसे खबर नही परवाह नही मेरे प्यार की

।।



शरद कुमार  श्रीवास्तव 



रविवार, 21 अप्रैल 2024

युग प्रणेता

 युग प्रणेता


चले अकेले

एक प्रण लेकर 

कथा रचने


गढ़ने नये

इतिहास  का पृष्ठ 

स्वर्णिम युग 


लोहे की छेनी

हथौड़ा साधारण 

जन मानस


विचार उगे

अद्भुत  अनुपम

सोने का मृग


ये मारीचिका

करती दिग भ्रान्त 

भटका लक्ष्य


संभलकर 

कोद॔ड उठाकर 

आखेट कर


लिखो कहानी

जन मानस पर

फिर उठके


सीता हरण

नही हो फिर कभी

आजानबाहु



शरद कुमार श्रीवास्तव 




गुरुवार, 18 अप्रैल 2024

तीसरी दुनिया (संस्मरण 2)

 


आप माने तो देवता, नहीं तो पत्थर  वाली कहावत  तीसरी दुनिया के अस्तित्व  पर भी लागू होती है।  मै इस संस्मरण  मे आपको अविश्वसनीय   टोटकों के कुछ  किस्से सुनाने जा रहा हूँ आप  को न विश्वास  हो तो महज संयोग  ही समझ लीजिएगा  पर कहानियो  मे तीसरी दुनिया का वजूद पर एक दृष्टिपात अवश्य  कीजिएगा 

1  .    किसी की आखों मे बेलनी (Sty) निकल आना एक साधारण  सी बात है।  इसके कुछ  चिकित्सीय  उपचार  भी उपलब्ध  हैं ।   घरेलू उपचार  मे एक  टोटका प्रचलित  है जिसे बेलनी  से परेशान  लोग  अपनाते भी हैं ।  इसके लिए  प्रातःकाल  तड़केसुबह  भुक्तभोगी को अपने इलाके के नवनिर्माण कृत घर के पास  जाकर  उस  नवनिर्माण कृत घर को मुँह  चिढ़ाकर वापस  आना होता है ।  प्राय: देखा गया है कि आँखों की बेलनी इससे बैठ जाती है।


2  छोटे बच्चों को अक्सर  नजर लग जाती है । नजर सबसे ज्यादा अपनो की ही लगती है ।   कहते हैं कि बच्चों को अपने  माँ बाप की नजर ही पहले लगती है।   नजर  लगने से बचाव  के उपाय बाज़ार  मे उपलब्ध  है जैसे कि गले मे काले धागे मे सोने का बना "हाय", कमर मे बाँधने के लिए  कालेधागे की करधनी इत्यादि।   बच्चे के कान के पीछे काजल का टीका आदि बहुत  प्रचलित  है।

बच्चे को जिसे नजर  लग चुकी है ।   उस बच्चे को तुरन्त  राहत देने के लिए  एक  विशेष  टोटका प्रचलित  है जिसमे एक  सूखा मिर्चा बच्चे के ऊपर  से सात बार घुमाकर आग मे जलाए  जाने पर कोई महक नहीं आती है ऐसा कहा जाता है।

3 .  मेरे एक करीबी रिश्तेदार  के नवजात शिशु के जन्म के कुछ  दिन बाद उसकी नाभि एक  बडे टमाटर  की आकृति की हो गई थी ।   बच्चे के माता पिता संपन्न होते हुए  उन्होने उस बालक  को बड़े से बड़े डाक्टर  को दिखलाया शायद  आधुनिक  चिकित्सा मे इसका ऑपरेशन  था उस  नवजात  शिशु के माता पिता कि यह अंतिम पसंद  होती परन्तु एक ग्रामीण  टोटके से वह विकार शीघ्र  बिना शल्य  चिकित्सा के दूर हो गया ।।

निराशा


रात की कालिमा गहराने लगी है

मेरे ख्यालों से बास आने लगी है

चटख आबनूसी सा  एक साया

मेरे एहसासों मे अब छाने लगा है


नींद  तो आती नही है कमबख्त 

तिमिर यहाँ छाया रहता हरवक्त

दर्द न फना होता है न मिटता है  

बनकर नासूर सा देह मे रिसता है 


इंतजार की चंद घड़ियाँ है साकी

टूटा पैमाना हूँ बिखरना है बाकी

जो वक्त साथ बिताया ऐ जिन्दगी

वह अब मेरा साथ नहीं दे पायेगा




शरद कुमार श्रीवास्तव 


गुरुवार, 7 मार्च 2024

सूखा पत्ता

 ठहरे पानी सा जीवन  

ऊबने लगा है ये मन

कतारबद्ध खड़ा हुआ

हलाल  होने  के  लिए

निरीह  पशु के  जैसा

व्यर्थ  पुकार  लगाता

 नकेल  समय के पास है 

 रेतना शुरू हो गया है

तिल तिल भर रुक रुक कर


सलीब पर पूछी जाती

अंतिम इच्छा कैदी की

 अभी नहीं!  न बाद मे भी, बस

धार दार छूरियाँ, आहिस्ता

आहिस्ता, हर बार फिरती रहेगी

 पतझड़  का इंतजार करते रहो

शायद सुनवाई  हो और

सूखा पत्ते को मोक्ष मिल जाए

 

शरद कुमार श्रीवास्तव