मंगलवार, 9 मई 2017




अनुभूति

ठहरे हुए जीवन मे भी  तरंगें
अंतर ध्वनित कंपन से उठती
या जगाती हैं अंतस का कंपन
परिपूरक चेतना  सी ध्वनित

ज्वार भाटा सी न हो  तो  भी
तरंगे तो उठती रहती हैं  सदा
हवा के स्पर्श से विचलित  हो
जीवन का एहसास  दिलाती

कंपित, तरंगित  अनुभूतियाँ
पाषाणों के पास भी तो  है
भूगर्भ की  निर्जीव शिलाओं  की
अनुभूतियाँ ही लाती हैं भूदोलन

शरद  कुमार  श्रीवास्तव