गुरुवार, 8 अगस्त 2019

दधीच 1


दधीच  1


पार्क  की   बेंच  पर  बैठी रितु बोर हो गई  थी  ।    प्रकाश  का कहीं पता नहीं  था ।    पार्क  में  लोग  संदेह  भरी नजरों  से  उसे  देख रहे  थे  ।  एक लडकी  का, बिना  किसी पुरुष  के साथ,  पार्क  में अकेले    निरर्थक बैठे रहना शोभा नहीं  देता  है  ।    रितु को , लेकिन यह   विश्वास  था,   कि  जब उसे  प्रकाश  ने आने को कहा है  तो वह आयेगा  जरूर ।   वह उसे   मोबाईल  करना  चाहती थी लेकिन  प्रकाश  ने उसे  फोन  करने  को मना  कर  रखा  था  ।   लोगों  की    घूरती  आंखों  ने रितु को  परेशान  कर  दिया  था ।     वह  सोच    रही  थी  कि  अगर  कुछ  देर  और प्रकाश  नहीं  आता  है  तो  वह अपने हाॅस्टल  लौट जाएगी  ।   अभी  वह इसके  लिए  सोंच ही रही थी  कि  सामने  से  प्रकाश  आते हुए  दिखाई  पडा़  ।   आफिस  से  सीधे  ही शायद   आ  रहा  था  ।   रितु  ने मुस्कराते  हुए,   लेकिन  शिकायती अंदाज  में,  उससे  कहा  कि  वह  काफी  समय  से  उसकी  प्रतीक्षा  कर  रही थी  ।    वह बस अब  जाने वाली  ही  थी  ।  हाॅस्टल  में   एक अनुशासन  का  पालन  करना  पड़ता  है  ।    प्रकाश  ने  रितु को  अपने  साथ  चलने का इशारा  किया  और  वह उसके  साथ  चल पडी ।

पास के  एक  रेस्तरां  में  एक  कोने  की  सीट पर वह दोनों  बैठ गए ।    चाय का  ऑर्डर  प्रकाश  ने दिया ।  एकान्त से रेस्तरां  मे शान्ति  पसरी पडी थी ।   प्रकाश चुप था और सीरियस  भी  ।   रितु को वह दुखी  दिखाई  पडा़  तो उसने  प्रकाश से  पूछा  "कुछ  दुखी  दिखाई  दे  रहे  हो ?"   प्रकाश  बोला  कि   राकेश  के विदेश  चले जाने  के बाद,  घर  खाने   को दौड़ता है   ।  रितु जानती थी कि  प्रकाश  राकेश  को  बहुत  प्यार  करता  है  ।   राकेश  , प्रकाश  का एकलौता  बेटा है।  दो वर्ष  पूर्व  ही  में हुई   प्रकाश  की पत्नी नीरा  की  मृत्यु  के  उपरांत राकेश ही प्रकाश  का सहारा  था ।   रितु  ने,  राकेश  के  बिछोह में  दुखी, प्रकाश के हाथ  को छूकर कहा कि  तुम्हें पता  है कि  वह  अपने अच्छे  भविष्य  के  निर्माण  के  लिए  गया  है और   तुम्ही ने  उसे भेजा  है   तो दुखी होने  की  क्या  बात  है  ।   प्रकाश  ने  कहा  हाँ , पर मै यह भी जानता  हूं  कि  अब वह मेरे  पास  से हमेशा  के  लिए  चला गया है ।   यह कह  वह और गम्भीर   हो गया ।   प्रकाश,    रितु  की तरफ शून्य को जैसे निहारते हुए बोला जब मैं अकेला महसूस करता हूँ तब  तुम  ही  हो  जिसकी  मुझे   याद आती है।    इसीलिए मुझसे  रहा नहीं गया और मैंने तुमसे मिलना चाहा।     क्या हम सिनेमा चल  सकते हैं।   रितु  बोली  कि  हास्टल  में मैंने  कुछ   कहा  नहीं  है  ।  बिना  कुछ  बोले  हॉस्टल  से  कहीं  चले जाने  से    लड़कियाँ  कटाक्ष करने  लगती हैं  ।   हाँ,  कल दिन  के  शो  में  चल  सकती  हूँ ।   प्रकाश ने कुछ  शरारत  भरे अंदाज  मे कहा कि   ठीक  है  कल ठीक  रहेगा रविवार  भी है ।   कल तुम  जल्दी  घर  पर  आ जाना  और मेरे  घर  का  किचेन  आबाद  करना ।

रितु, प्रकाश के  काॅल सेन्टर  में ही  प्रकाश की निकटतम सहयोगी थी ।   लगभग  पाँच-छह सालों  से  उसके  स्टेनो , पी ए , एकाउंटेंट  तक के सभी  काम वही देखती थी  ।    प्रकाश  की पत्नी  नीरा  की मृत्यु  के  बाद प्रकाश टूट  सा गया  था  ।  उस समय   भावनात्मक  सहारा  भी रितु ने ही  दिया  था ।   प्रकाश  के  परिवार  में  राकेश  को छोड़  कर  और कोई नहीं  था , रितु का सहारा  प्रकाश  के लिये  बहुत  मायने रखता  था ।   रितु  राकेश   से भी  स्नेह  करती  थी  । अतः राकेश के समय मे भी प्रकाश  के घर रितु  का  आना  जाना  सामान्य रूप में होता था।   प्रकाश  का निमंत्रण  उसने सहर्ष  स्वीकार  कर  लिया  था ।

 रविवार  को रितु का  हास्टल  प्राय: खाली  ही रहता है  । उस महिला  हॉस्टल मे  सभी  कामकाजी महिलाएं ही  हैं  ।  सप्ताह  भर के कपड़ों  की धुलाई कराने  और उन्हें   प्रेस  कराने  का  काम  भी हॉस्टल  की 'आया'  के  जिम्मे  सौपकर  मौज मस्ती  के  साथ  दिन बाहर ही  बिताती  हैं या वे महिलाएँ  जिनके परिवार  पास  के  शहर या कस्बों में  हैं  अपने  परिवार  से  मिलने  बिला-नागा चली जाती हैं ।   रविवार  को   हाॅस्टल प्रायः खाली  हो जाता  है ।   रितु भी हॉस्टल से   जल्दी  ही  प्रकाश  के  घर आ गई   ।   प्रकाश उस समय   अपने घर मे चाय   का कप हाथ मे लेकर  अखबार  पढ़  रहा  था ।    रितु  आई  और प्रकाश  के  सामने  के सोफे  पर  बैठ  गई  ।   प्रकाश  ने  केटली से एक  कप चाय बना  कर रितु  को  दिया  ।   चाय पीते  हुए  प्रकाश  ध्यान  से  रितु को देख रहा  था  ।    उसे अचानक  लगा  कि    रितु उसके  लिए ही   बनी है ।  उसके  बगैर वह  जीवन कैसे जी रहा  था  ।    उस समय  न जाने  क्या  हुआ  उसने  रितु का हाथ प्यार से   थाम  लिया और उस के  सामने अचानक   विवाह  का  प्रस्ताव  रख दिया  ।    रितु  ने प्रकाश  को एक  बार  देखा  और प्रकाश  के  शादी  के  इस प्रस्ताव  की  इस   बात  को  मजाक  में  ले लिया  ।   उसे विश्वास  नहीं  था कि  प्रकाश  उसके  सामने  ऐसा  प्रस्ताव  रखेगा   क्योंकि   प्रकाश  और रितु  की  आयु  में  बहुत बड़ा   अंतर  है।   वह खुलकर  किसी  और मामले  में  अपने  पुनर्विवाह न करने के  बारे  में उसे  बता  चुकी थी ।    उनमें  लगभग  डेढ़  साल  से उनके  बहुत  आत्मीय संबंध हैं ।   एक मित्र  की तरह  वे अपने  दुख सुख  शेयर  करते रहे हैं ।   उसे ज्ञात था कि    प्रकाश मजाकिया  स्वभाव  होने  के  कारण  अक्सर चुलबुले  मजाक  किया  करता था ।   अतः रितु ने इस बार भी इस बात को मजाक में ही लिया।  रितु ने कुछ  नहीं  कहा सिर्फ   मुस्कराते  हुए  किचेन  की  ओर  चली  गयी  उसे  खाना  बनाना  था  और उसके  बाद  पिक्चर  भी जाना  था।
 
     फ्रिज  से  सब्जी  निकाल  कर  उन्हें  साफ कर  काटने  लगी ।   लेकिन  उसके कानों  में  प्रकाश  के द्वारा  किया  विवाह  का  प्रस्ताव  गूंज  रहा  था  ।    विवाह  के  नाम  से ही अब  उसके  मन  में वैसे  ही    घबराहट  होने  लगती थी   ।   यह बात  प्रकाश  को  अच्छी  तरह  से  पता  थी।     आठ  साल पहले  ही  विवाह नामक प्रताड़ना  झेल  कर आई थी  ।    अपनी  छह साल  की  बेटी  को अपने  पूर्व  पति  के  पास  छोड़  कर चली  आई थी  ।    उसके  पति ने  उससे उसकी  बच्ची को  छीन  लिया  था  ।   बड़ी  मुश्किल  से  वह  बेटी  के  बिछोह  के  कष्ट से   उबर पाई थी  ।   सब्जी  काटती  जा रही थी  और उसके  मन में  पुराने  विवाह  के  कुछ  दृश्य  फ्लैश  हो  रहे थे।

रितु  तब 24 -25 वर्ष  की  रही होगी  जब उसकी  शादी  बड़ी  धूमधाम  से   उसके माता पिता  ने  लंदन  निवासी  एक  व्यक्ति  से कर दिया  था  ।    यह विवाह उसके  पिता  के मित्र  के  बेटे के  साथ  हुआ था ।   लंदन  में  बसे रितु के  पिता  के  मित्र  को  अपने  बेटे  के  लिए  भारत  की  लड़की  ही चाहिए  थी ।  रितु का पति  विनय का जन्म  भले ही  लंदन में  नहीं  हुआ  हो परन्तु  उसकी  पढ़ाई  लिखाई   सब  लंदन  में  ही  हुई  थी  ।    रितु   भारतीय  परिवेश  में  पढी लिखी परन्तु  आधुनिक  और स्वच्छंद  विचारो वाली  लडकी  थी ।   शादी  के  बाद  बात बात मे टकराव  हो जाता था ।

रितु तल्लीनता  से पुराने  विचारों  में  खोई हुई  थी   कि  प्रकाश वहां  आ गये और उन्होंने पिक्चर  छूट जाएगी  इस लिए   खाना  बनाने  में  जल्दी करने के लिए  कहा ।   रितु ने प्रकाश  की  ओर  देखा  और  कहा  कि  आप तैयार  हो  जाइये  मैं  जल्दी  ही  खाना  लगातीं  हूँ ।   प्रकाश  ने  उसका चेहरा  अपने  हाथों  में  लिया  और उसकी आँखों  में  झांका  ।  रितु की  आँखों  में मायूसी  देख रहा  था ।  उसने  रितु  से कहा  कि  तुम  उदास  क्यों हो गई  हो  ।  मैंने तो तुमसे  विवाह  की बात  ही की   है ।   रितु  प्रकाश  के सामने   अपना सिर  झुकाए रही  और बोली तुम्हें  मेरा  अतीत वर्तमान  सब   मालूम  है  ।  तुम  अच्छी  तरह  से  जानते  हो कि  हम दोनों  एक दूसरे  के  अच्छे  मित्र  हैं  एक  दूसरे  का सम्मान  करते  हैं  और  एक दूसरे  का भला चाहते  हैं    ।     यह  मित्रता  यू  ही  बनी रहे वही उत्तम है  शादी के  बंधन में  हम न बंधें ।    फिर  वह हँस  कर  बोली  कि  विवाह  करके  हम कितने  बेमेल  लगेंगे  ।   उसका इशारा  उम्र  के  अंतर की  तरफ ,  प्रकाश  की  कनपटी से झाँकते  सफेद  बालों  की  तरफ था ।

प्रकाश गंभीर हो चला  था। वह बोला  कि   सात आठ  सालो से  तुम  एकाकी  रहती हो। क्या  तुम्हें  पुरुष  की आवश्यकता  महसूस  नहीं  होती  है   ।   मुझे  तो नीरा के  जाने  के  छह  महीने  के  बाद  से  ही  नारी  की  कमी  खलने लगी थी  ।  अगर  हम शादी कर लेंगे  तो साथी की  कमी दूर हो  जाएगी ।  यह ठीक  है कि  हम अच्छे  दोस्त  हैं   और बाद  में  भी  रहेंगे ।      रितु निरुत्तर  थी  ।  काफ़ी  दिनो से प्रेम की  एक  सूखी नदी को जैसे  उमड़ते मेघ  का सामना  हुआ  हो इस तरह वह  प्रकाश  के प्रणय के  आवाह्न के  सम्मोहन  में  खिंची  चली आयी ।  वह नारी  पुरुष के  सम्बन्ध के लिए काफी  दिनों  से  दुविधा  में जी रही  थी  ।  परन्तु अपने पुराने अनुभवों के कारण वह  शादी  से  घबराती थी ।  इस समय प्रकाश के सम्मोहन मे आगे बढ़ रही थी।  तब प्रकाश ने  उसे आगे बढ़ कर थाम लिया और अपने  सीने  से उसे  लगा लिया । वह  उसे नकार नहीं  सकी।   प्रकाश  उत्साहित  होकर   अपने  रूम  में  लेकर  आ गया ।    रितु प्रकाश   की  बाहों  में  पिघलती जा रही थी ,  कि  उसी समय  प्रकाश  का फोन  बज उठा ।  यह राकेश  का वीडियो  काॅल था ।    प्रकाश  से हड़बड़ी  में  फोन  नीचे  गिर  गया  और फोन  बंद  हो  गया  ।    रितु तब तक  संभल  चुकी  थी  और  प्रकाश  से  अलग  हो  गई  थी ।    प्रकाश भी सचेत  हो  गया  था  ।   उसने  रितु से कहा  कि हम अतिरेक आवेग मे थे और  इस  फोन  ने हमें हमारे असुरक्षित यौन संबंध से हमे  बहुत  बचाया ।     गए ।


शरद कुमार  श्रीवास्तव 


  

मंगलवार, 14 मई 2019

इस तपती धूप में
कोई भी साथ नहीं
सिर्फ मैं हूँ मेरा हमसफर
या फिर मेरी परछाईं
सी मेरी यादें

और
दूर तक पसरा है
एक अन्तहीन सन्नाटा
गर्म हवाओं के थपेड़ों को
बाकी सफर मे झेलता
मेरा नितांत एकाकीपन
लक्ष्यहीन, अदृश्य महापड़ाव तक

शरद कुमार श्रीवास्तव





बुधवार, 6 मार्च 2019

बसन्त ऋतु का आगमन



आया बसन्त, नव पल्लव हैं आए तरु पर
ऐसे लगता तुम ही जैसे आये हो  गिरधर,
पर्वत लगे पिघलने, बन कर जल निर्मल
जो नदियों की गोद में बहता है कलकल

कामदेव का राज खुशियाँ हरेक तरूपर
कुसुमित सुरभित विटप लहराते हैं सुंदर
सरसों फूल बिखेरें पीली आभा सुखकर
अनंगपुत्र तेरे ही वसन पहने हों  मनहर

चटख रहीं कलियाँ कलियाँ रूप संजोये
जल कणिकाओं के हार तेरे लिए पिरोये
लेकर वसंत राग पेड़ों पर कोकिला बोले
मकरन्द लोलुप भ्रमर दल फूलों पे डोले

शरद कुमार श्रीवास्तव






गुरुवार, 31 जनवरी 2019

प्यारो नैन रावरो हे सांवरो मन मोह लियो मोर




प्यारो नैन रावरो हे सांवरो  मन मोह लियो मोर
सलोनो रूप रावरो  सांवरो मन मोह लियो मोर
शिर पे सोहे मोर मुकुट अधरन से बंसी बजायें
लेके लकुटिया बन मे ग्वालन संग गैय्या चरावें

प्यारो नैन रावरो सांवरो लख मन हर्षित मोर

रण मा तुम ठाढ भयो तबहू रनछोड़ है कहायो
ग्वालन संग गैय्या चराय के माखनचोर कहायो
सखियन संग रास रचाय बृज मा धूम है मचायो
अंगुरी ते परबत उठाय मानुस, गोधन है बचायो

प्यारो नैन रावरो हे सांवरो मन मोह लियो मोर

देखेन हम जबते तोर सुंदर सी सूरत हे संवरिया
सुध बुध हेराई दिहेन देखके मोहनी सी सुरतिया
राधा संग बनी रहे तुम्हरी सुन्दर प्यारी सी जोड़ी
शरद केर सुध लेत रहौ सुनो हे राधे श्याम थोड़ी

प्यारो नैन रावरो हे सांवरो मन मोह लियो मोर
सलोना रूप रावरो सांवरो मन मोह लियो मोर

शरद कुमार श्रीवास्तव 


हे मित्र 2018
विदाई तुम्हारी हो रही है
सारा विश्व भूला तुरंत
आगत के स्वागत में जुटा है
 देखता हूँ पलटकर तू
विगत के प्रकोष्ठ पर सटा है
बहुत कुछ गोचर है लेकिन
कुछ गुमनामी मे  बटा है
कैसे भूल जाऊं तुमको
दिये कितने लम्हे प्यारे
दिया मुझको बहुत कुछ
खुशियों के प्रसून सारे
मृत्यु के सानिध्य से मुझको निकाला
साढ़ेसाती के प्रकोप का मै था निवाला
ज्येष्ठा पुत्री के आंचल मे प्यारी नातिन को डाला
न भूलेंगे कभी हे 2018 तुमको कभी भी
उपकार तुम्हारे बहुत , ऋणी है हम चिर तुम्हारे

शरद कुमार श्रीवास्तव 

आई लव यू

मेरे जीवन में रस घोल गयी
वह आई लव यू  बोल गयी
ऊषा किरण सबेरे आई थी
कुछ मधुर मधुर मुस्काई थी
चितवन से मिश्री घोल गयी
बस आई लव यू बोल गयी

लो आई पूजा अर्चना की थाली
अक्षत तुलसी बिल्व युत आली
नव कुसुम, कुमकुम रोली लाली
सुगंधित धूप, लौ आरती वाली
आस्था श्रद्धा के रंग घोल गयी
घन्टी सुर से लव यू बोल गयी

दसों दिशाएँ मे लपेटे हुए पहर
दिगन्तों मे फैले प्रणव के स्वर
दिन दुपहरी के वे पल दुष्कर
श्रम बिन्दु बिखरे मस्तक पर
मेरे जीवन मे मिश्री घोल गयीं
एहसासों मे लव यू बोल गयीं

सोंधी खुश्बू उड़ती वसुधा की
घर बगिया मे फैली वसुधा की
अपनो सी ही अपनी वसुधा की
हर बात निराली इस वसुधा की
मेरे अन्तर मे जादू  घोल गयी
प्यार से आई लव यू बोल गयी

बागों में कोयल के स्वर आली
सुरीली सी मद की भरी प्याली
उल्लसित बगिया की हरियाली
पुष्प कलिकाएं अंक भर थाली
मेरे स्वदेश की शोभा बने आली
मुझको वे आई लव यू बोल गयी

शरद कुमार श्रीवास्तव