दधीच 1
पार्क की बेंच पर बैठी रितु बोर हो गई थी । प्रकाश का कहीं पता नहीं था । पार्क में लोग संदेह भरी नजरों से उसे देख रहे थे । एक लडकी का, बिना किसी पुरुष के साथ, पार्क में अकेले निरर्थक बैठे रहना शोभा नहीं देता है । रितु को , लेकिन यह विश्वास था, कि जब उसे प्रकाश ने आने को कहा है तो वह आयेगा जरूर । वह उसे मोबाईल करना चाहती थी लेकिन प्रकाश ने उसे फोन करने को मना कर रखा था । लोगों की घूरती आंखों ने रितु को परेशान कर दिया था । वह सोच रही थी कि अगर कुछ देर और प्रकाश नहीं आता है तो वह अपने हाॅस्टल लौट जाएगी । अभी वह इसके लिए सोंच ही रही थी कि सामने से प्रकाश आते हुए दिखाई पडा़ । आफिस से सीधे ही शायद आ रहा था । रितु ने मुस्कराते हुए, लेकिन शिकायती अंदाज में, उससे कहा कि वह काफी समय से उसकी प्रतीक्षा कर रही थी । वह बस अब जाने वाली ही थी । हाॅस्टल में एक अनुशासन का पालन करना पड़ता है । प्रकाश ने रितु को अपने साथ चलने का इशारा किया और वह उसके साथ चल पडी ।
पास के एक रेस्तरां में एक कोने की सीट पर वह दोनों बैठ गए । चाय का ऑर्डर प्रकाश ने दिया । एकान्त से रेस्तरां मे शान्ति पसरी पडी थी । प्रकाश चुप था और सीरियस भी । रितु को वह दुखी दिखाई पडा़ तो उसने प्रकाश से पूछा "कुछ दुखी दिखाई दे रहे हो ?" प्रकाश बोला कि राकेश के विदेश चले जाने के बाद, घर खाने को दौड़ता है । रितु जानती थी कि प्रकाश राकेश को बहुत प्यार करता है । राकेश , प्रकाश का एकलौता बेटा है। दो वर्ष पूर्व ही में हुई प्रकाश की पत्नी नीरा की मृत्यु के उपरांत राकेश ही प्रकाश का सहारा था । रितु ने, राकेश के बिछोह में दुखी, प्रकाश के हाथ को छूकर कहा कि तुम्हें पता है कि वह अपने अच्छे भविष्य के निर्माण के लिए गया है और तुम्ही ने उसे भेजा है तो दुखी होने की क्या बात है । प्रकाश ने कहा हाँ , पर मै यह भी जानता हूं कि अब वह मेरे पास से हमेशा के लिए चला गया है । यह कह वह और गम्भीर हो गया । प्रकाश, रितु की तरफ शून्य को जैसे निहारते हुए बोला जब मैं अकेला महसूस करता हूँ तब तुम ही हो जिसकी मुझे याद आती है। इसीलिए मुझसे रहा नहीं गया और मैंने तुमसे मिलना चाहा। क्या हम सिनेमा चल सकते हैं। रितु बोली कि हास्टल में मैंने कुछ कहा नहीं है । बिना कुछ बोले हॉस्टल से कहीं चले जाने से लड़कियाँ कटाक्ष करने लगती हैं । हाँ, कल दिन के शो में चल सकती हूँ । प्रकाश ने कुछ शरारत भरे अंदाज मे कहा कि ठीक है कल ठीक रहेगा रविवार भी है । कल तुम जल्दी घर पर आ जाना और मेरे घर का किचेन आबाद करना ।
रितु, प्रकाश के काॅल सेन्टर में ही प्रकाश की निकटतम सहयोगी थी । लगभग पाँच-छह सालों से उसके स्टेनो , पी ए , एकाउंटेंट तक के सभी काम वही देखती थी । प्रकाश की पत्नी नीरा की मृत्यु के बाद प्रकाश टूट सा गया था । उस समय भावनात्मक सहारा भी रितु ने ही दिया था । प्रकाश के परिवार में राकेश को छोड़ कर और कोई नहीं था , रितु का सहारा प्रकाश के लिये बहुत मायने रखता था । रितु राकेश से भी स्नेह करती थी । अतः राकेश के समय मे भी प्रकाश के घर रितु का आना जाना सामान्य रूप में होता था। प्रकाश का निमंत्रण उसने सहर्ष स्वीकार कर लिया था ।
रविवार को रितु का हास्टल प्राय: खाली ही रहता है । उस महिला हॉस्टल मे सभी कामकाजी महिलाएं ही हैं । सप्ताह भर के कपड़ों की धुलाई कराने और उन्हें प्रेस कराने का काम भी हॉस्टल की 'आया' के जिम्मे सौपकर मौज मस्ती के साथ दिन बाहर ही बिताती हैं या वे महिलाएँ जिनके परिवार पास के शहर या कस्बों में हैं अपने परिवार से मिलने बिला-नागा चली जाती हैं । रविवार को हाॅस्टल प्रायः खाली हो जाता है । रितु भी हॉस्टल से जल्दी ही प्रकाश के घर आ गई । प्रकाश उस समय अपने घर मे चाय का कप हाथ मे लेकर अखबार पढ़ रहा था । रितु आई और प्रकाश के सामने के सोफे पर बैठ गई । प्रकाश ने केटली से एक कप चाय बना कर रितु को दिया । चाय पीते हुए प्रकाश ध्यान से रितु को देख रहा था । उसे अचानक लगा कि रितु उसके लिए ही बनी है । उसके बगैर वह जीवन कैसे जी रहा था । उस समय न जाने क्या हुआ उसने रितु का हाथ प्यार से थाम लिया और उस के सामने अचानक विवाह का प्रस्ताव रख दिया । रितु ने प्रकाश को एक बार देखा और प्रकाश के शादी के इस प्रस्ताव की इस बात को मजाक में ले लिया । उसे विश्वास नहीं था कि प्रकाश उसके सामने ऐसा प्रस्ताव रखेगा क्योंकि प्रकाश और रितु की आयु में बहुत बड़ा अंतर है। वह खुलकर किसी और मामले में अपने पुनर्विवाह न करने के बारे में उसे बता चुकी थी । उनमें लगभग डेढ़ साल से उनके बहुत आत्मीय संबंध हैं । एक मित्र की तरह वे अपने दुख सुख शेयर करते रहे हैं । उसे ज्ञात था कि प्रकाश मजाकिया स्वभाव होने के कारण अक्सर चुलबुले मजाक किया करता था । अतः रितु ने इस बार भी इस बात को मजाक में ही लिया। रितु ने कुछ नहीं कहा सिर्फ मुस्कराते हुए किचेन की ओर चली गयी उसे खाना बनाना था और उसके बाद पिक्चर भी जाना था।
फ्रिज से सब्जी निकाल कर उन्हें साफ कर काटने लगी । लेकिन उसके कानों में प्रकाश के द्वारा किया विवाह का प्रस्ताव गूंज रहा था । विवाह के नाम से ही अब उसके मन में वैसे ही घबराहट होने लगती थी । यह बात प्रकाश को अच्छी तरह से पता थी। आठ साल पहले ही विवाह नामक प्रताड़ना झेल कर आई थी । अपनी छह साल की बेटी को अपने पूर्व पति के पास छोड़ कर चली आई थी । उसके पति ने उससे उसकी बच्ची को छीन लिया था । बड़ी मुश्किल से वह बेटी के बिछोह के कष्ट से उबर पाई थी । सब्जी काटती जा रही थी और उसके मन में पुराने विवाह के कुछ दृश्य फ्लैश हो रहे थे।
रितु तब 24 -25 वर्ष की रही होगी जब उसकी शादी बड़ी धूमधाम से उसके माता पिता ने लंदन निवासी एक व्यक्ति से कर दिया था । यह विवाह उसके पिता के मित्र के बेटे के साथ हुआ था । लंदन में बसे रितु के पिता के मित्र को अपने बेटे के लिए भारत की लड़की ही चाहिए थी । रितु का पति विनय का जन्म भले ही लंदन में नहीं हुआ हो परन्तु उसकी पढ़ाई लिखाई सब लंदन में ही हुई थी । रितु भारतीय परिवेश में पढी लिखी परन्तु आधुनिक और स्वच्छंद विचारो वाली लडकी थी । शादी के बाद बात बात मे टकराव हो जाता था ।
रितु तल्लीनता से पुराने विचारों में खोई हुई थी कि प्रकाश वहां आ गये और उन्होंने पिक्चर छूट जाएगी इस लिए खाना बनाने में जल्दी करने के लिए कहा । रितु ने प्रकाश की ओर देखा और कहा कि आप तैयार हो जाइये मैं जल्दी ही खाना लगातीं हूँ । प्रकाश ने उसका चेहरा अपने हाथों में लिया और उसकी आँखों में झांका । रितु की आँखों में मायूसी देख रहा था । उसने रितु से कहा कि तुम उदास क्यों हो गई हो । मैंने तो तुमसे विवाह की बात ही की है । रितु प्रकाश के सामने अपना सिर झुकाए रही और बोली तुम्हें मेरा अतीत वर्तमान सब मालूम है । तुम अच्छी तरह से जानते हो कि हम दोनों एक दूसरे के अच्छे मित्र हैं एक दूसरे का सम्मान करते हैं और एक दूसरे का भला चाहते हैं । यह मित्रता यू ही बनी रहे वही उत्तम है शादी के बंधन में हम न बंधें । फिर वह हँस कर बोली कि विवाह करके हम कितने बेमेल लगेंगे । उसका इशारा उम्र के अंतर की तरफ , प्रकाश की कनपटी से झाँकते सफेद बालों की तरफ था ।
प्रकाश गंभीर हो चला था। वह बोला कि सात आठ सालो से तुम एकाकी रहती हो। क्या तुम्हें पुरुष की आवश्यकता महसूस नहीं होती है । मुझे तो नीरा के जाने के छह महीने के बाद से ही नारी की कमी खलने लगी थी । अगर हम शादी कर लेंगे तो साथी की कमी दूर हो जाएगी । यह ठीक है कि हम अच्छे दोस्त हैं और बाद में भी रहेंगे । रितु निरुत्तर थी । काफ़ी दिनो से प्रेम की एक सूखी नदी को जैसे उमड़ते मेघ का सामना हुआ हो इस तरह वह प्रकाश के प्रणय के आवाह्न के सम्मोहन में खिंची चली आयी । वह नारी पुरुष के सम्बन्ध के लिए काफी दिनों से दुविधा में जी रही थी । परन्तु अपने पुराने अनुभवों के कारण वह शादी से घबराती थी । इस समय प्रकाश के सम्मोहन मे आगे बढ़ रही थी। तब प्रकाश ने उसे आगे बढ़ कर थाम लिया और अपने सीने से उसे लगा लिया । वह उसे नकार नहीं सकी। प्रकाश उत्साहित होकर अपने रूम में लेकर आ गया । रितु प्रकाश की बाहों में पिघलती जा रही थी , कि उसी समय प्रकाश का फोन बज उठा । यह राकेश का वीडियो काॅल था । प्रकाश से हड़बड़ी में फोन नीचे गिर गया और फोन बंद हो गया । रितु तब तक संभल चुकी थी और प्रकाश से अलग हो गई थी । प्रकाश भी सचेत हो गया था । उसने रितु से कहा कि हम अतिरेक आवेग मे थे और इस फोन ने हमें हमारे असुरक्षित यौन संबंध से हमे बहुत बचाया । गए ।
शरद कुमार श्रीवास्तव