मंगलवार, 18 दिसंबर 2018

एकान्त की मदहोशियां




भोर घिर आई छुप गयी रात है
वेदना के स्वर अब भी मुखरित
जाने ये कैसी जाने क्या बात है
थमी आखें, यादों की बारात है

ऊषा की लालिमा है चटख सी
रात रानी तसव्वुर मे है महकती 
काली घटा नयन में है बहकती
उदधि से उर मे उमड़े हालात है

रात का पल चपला सी लडी थी
ख्यालों में यादो की बूँदें  पडीं थी
कुछ ही देर  क्यों ठंडक पडी थी
उमस के पल के शुरू की घड़ी थी

रात्रि के आगोश में दफन दर्द सारे 
दो बूँद आब, फिर कोई भी पुकारे
रात की तन्हाईयाँ यूं खलती नहीं है 
सबों से तल्खियां मिटती भी नहीं हैं

तसव्वुर मे तुम न आओ या कोई भी
तल्खियां साथ हैं जरूरी न कोई भी
गमों से कोई साबका अपना नहीँ है
साथ एकान्त की मदहोशियां बड़ी हैं

शरद कुमार श्रीवास्तव

बुधवार, 26 सितंबर 2018






कुछ समय पहले

जेठ की एक सुबह
प्रगटा था तुम्हारा अवतार
तब बह रही थी
शीतल ठंडी हवा
मोहती मन
था स्वच्छ आकाश
निर्मल था गगन
अनुकूल वातावरण

सूर्योदय की
अरुणिमा भी थी
बिन बादल के
खुश थी दिशाएं
मदमस्त क्षितिज
गमका हुआ

पर सामने था
अग्निपथ विस्तृत
भीषण धूप
लू के थपेड़े
सूखे ताल-तलैये
न कोई ठौर

बेरोक टोक
स्वच्छन्द धुन पर
चलना था तुझे

आज भी वही
सामने है और
आने वाली है परीक्षा
घबरा मत बटोही

तू चलता जा
बस चलता जा

विजय को आना
ही होगा मिलने
युग पुरुष

शाम तलक
मंजिल आने तक
बटोही मन

बुधवार, 5 सितंबर 2018



आसमानो से शहद है बरसा
पास में रजनीगंधा है महका
एकान्त के राग भी हैं सुरीले
मदमाते हुए प्याले से रसीले

वेदना के सुर हैं गम के सारे
आये जैसे हों छू देश तुम्हारे
हृदय श्रृंखला लो खनक उठी
सब तरफ तुम्हारी महक उठी

हर्ष- विषाद के सब फीके रस
शेष रह गया यह जीवन  बस
 पूस माघ की ये रात अंधियारी
सुरभित पर मन मे याद तुम्हारी

यह मेरी बेसब्र मेरी बेचैन निगाहें
ताकती आस्मां से आती हुई राहें
कतरा कतरा ओस जब बरसता है
खुश्बुए गेसू को ये मन तरसता है

शरद कुमार श्रीवास्तव















गुरुवार, 24 मई 2018





यादों के आगर मे अगिनित नील कमल हैं
बिछड़े साथी तुम्हारे साथ बिताए  पल हैं
यादों  के  अमूल्य सुमन लेकर  आया  हूँ
फोटो पर मैं अश्रु समर्पित करने आया  हूँ

शरद कुमार  श्रीवास्तव





सोमवार, 7 मई 2018

तीसरी  दुनिया  ( एक  संस्मरण) 

तीसरी  दुनिया  ( एक  संस्मरण)

सन् 1972 -73 की बात है  लखनऊ  में जगह जगह लोग  कहते  फिरते थे कि   प्रभात स्टोव में एक पहुंचे  हुए महात्मा  की आत्मा  आती थी ।   इस बात  का बहुत  प्रचार  था ।   जिज्ञासा  वश अथवा  कौतुहल  वश जहाँ  देखो  लोग  उन महात्मा  की आत्मा  का आह्वान  उस स्टोव के  माध्यम से  करते थे,  जिसकी प्रक्रिया  बहुत  सरल थी ।  प्रभात  स्टोव,  मिट्टी  के  तेल  से  जलने  वाला, एक  स्टोव था,  जो प्राय: उस समय  सभी घरों में  उपलब्ध  था ।   उक्त  दिवंगत  महात्मा  की  आत्मा  को  आह्वान  करने  की  प्रक्रिया  भी बहुत  सरल थी ।    उस स्टोव की टंकी को  बस  खाली करके पूरे स्टोव को टंकी  सहित  बड़ी  सफाई  से धोकर  उसकी  टंकी  में  चीनी का शर्बत  भर दिया  जाता था और स्टोव महान आत्मा  के  आह्वान  के लिए  तैयार  हो  जाता था ।

पुराने  जमाने  के  लोगों  को  याद  होगा  कि  इस  स्टोव में   तीन  टांगे  हुआ  करती थी ।   पम्प  वाले  इस  स्टोव में   महान आत्मा  के  आह्वान  के  समय  पम्प  का कोई  मतलब नहीं होता  था  ।   बस एक स्वच्छ  स्थान  पर  रख कर  तीन  कुंवारी  कन्याओं  को  स्टोव के  तीन  पैरों  के  ऊपरी  भाग  में
 अपनी  तर्जनी  रख कर  स्टोव देवता के  नाम  से  मशहूर  उन महान  आत्मा  का आह्वान  करना  होता  था  ।   मेरे घर में  एक  शादी थी  अत: मैं  भी घर के   रिश्तेदारों  के  समागम में  वहाँ  उपस्थित था ।  मेरे  सामने   उस महान आत्मा  का आह्वान तीन कुआँरी कन्याओं  के द्वारा   किया  गया  ।   उन  कन्याओं, जो  मेरी ही बहने  थीं ,  ने एकल स्वर में  कहना  प्रारंभ  किया  कि स्टोव  देवता  आओ स्टोव देवता  आओ।  मेरे  आश्चर्य  की सीमा  न रही जब  मैंने  देखा  कि  एकदम  से स्टोव की  एक  टांग  ठक ठक करने  लगी ।  चूँकि  सभी  लडकियाँ  मेरी  बहने  थी और सभी  सरल स्वभाव वालीं  थी, इसलिए  शक्-शुबह की कोई  गुंजाइश  नहीं  थी।   सभी दर्शकों  में   एक  आनंद  मिश्रित  कौतुहल छाया   हुआ था ।

दर्शकों  मे से किसी ने कहा  कि  देवता आ गये हैं  फिर  उन्हीं   से  ही  किसी  एक  ने स्टोव में  आईं  तथाकथित  आत्मासे  पूछा  कि  शर्बत  में  मीठा  ठीक  है ।   स्टोव से कोई प्रतिक्रिया  नहीं आई ।  इस पर   फिर किसी  ने कहा  शक्कर  और चाहिये  ।   स्टोर से ठक  की एक आवाज़  आई ।    हम सब मंत्र मुग्ध होकर यह   सब देख रहे  थे ।   लोग  अलग अलग  प्रश्न  पूछ  रहे  थे  और स्टोव देवता  ठक ठक कर उत्तर  दे रहे  थे  ।  मुझे  यह समझ  में  नहीं  आया  कि  लोग अपने सवालों के   सही उत्तर  पा रहे हैं  या नहीं  ।   तबतक  मेरी एक  अन्य  बहन जो  वहाँ  बैठी थी उन्होंने मुझसे   जुड़ा एक  प्रश्न  स्टोव देवता के  सामने  पेश  कर  दिया ।  अब मेरे  कान खड़े करने की  बारी  थी  ।  मै बहुत  ध्यान  से स्टोव  देवता का उत्तर  सुन रहा था ।  उस समय  स्टोव देवता  का उत्तर   मुझे  हास्य -पद   लगा।   उस प्रश्न  के उत्तर  में  स्टोव देवता ने 17 बार  ठक किया  था।  मैंने  उस समय  उक्त  महात्मा   के  संदेश  पर संदेह  व्यक्त  किया  ।  समय  के  साथ  बात आई-गई  हो  गई  ।   परन्तु    वर्ष  1988-89 में  जब मेरा बैंक  की ओडिशा  में  स्थित एक  शाखा   से अंतरराज्यीय  -स्थानांतरण लखनऊ के  बैंक  के  कार्यालय  में  हुआ   तब मुझे  1972-73 के  स्टोव  देवता  के  17  बार  के  ठक ठक की  याद  आई  और आश्चर्य  हुआ । अब  आप ही  बताइए  कि  मुझे  तृतीय  विश्व  के  वजूद का विश्वास  क्यो  नही  करना चाहिए  ।


  1. शरद कुमार श्रीवास्तव 

रविवार, 6 मई 2018

एक चैती गीत



टेसू के फूल  खिले हैं  रामा
बगियन में  मा  अमवा~~
खुशी के दिन अइ गे हो  रामा
खलिहान  मा अनजवा

सोना लदे बिरवन मा हो रामा
अंगना मा गोरियाँ
महकन लगे बिरुआ मा महुआ हो रामा
अनाज भरी  बोरियाँ

नवमी का जनमिहैं  महल मा हो रामा
कौसिलिया दसरथ के  दुलरुआ
सब लोगवा लुटइहैं गहना असर्फी हो रामा
बधाई  राजा के  दुअरुआ





शनिवार, 3 मार्च 2018

बसंत की सुबह

ऊषा  की नई किरणे लेके
बसंत का मौसम  आया
नव प्रभात के स्वागत से
दृग तृप्त हुए मन हर्षाया

लो लुप्त हुई है चहुँओर धुंध
पतझड़ का क्षण बीत गया
ऊषा की किरणें  आने से
रात्रि  प्रहर अब बीत गया

झांकते नव पल्लव तरु से
देख उन्हें मेरा मन हर्षाया
कोमल कोपलें सजी धजी
देख विटप मन शरमाया

तृण शिखरों पे चमक रहे
हैं हीरक कण शुभ्र-धवल
सुरभित मंद हवा बह रही
थिरकती कलिकाएं नवल

फैला हुआ है कलियों का
सौंदर्य, ये बसंत है आली
बह रही हवा दिगंतों तक
मधुर मदिर मादक वाली

हैं पत्ते भी पेडों पे झूम रहे
पा झोंके मस्त हवाओं के
निर्मल आकाश बिछा हुआ
स्वागत नई फिजाओं के

पिक सुक कोकिला भी तो
वृक्ष पे मधुर गीत सुनाते हैं
मधुमास के  सब रंगों  में
गाकर सुन्दर रंग  मिलाते हैं

शरद  कुमार  श्रीवास्तव

शुक्रवार, 2 मार्च 2018

रेशमी एहसास







शब भर इन्तज़ार करता  रहा
रेशमी  हवाओं  की दस्तक का
कारवाँ धूल भरी गर्दिश का था
गुजरे लम्हों के  संग बीत गया

आ गया इस नायाब से गुलशन में
कैक्टस संग जुम्बिश करता हुआ  मै
जख्म भरे पैर और कांटों से याराना
न कोई उफ़, शिकवा की  गुलशन से

अभी अभी  तो गई है भिनसार से
ख्यालों में आई हुई रेशमी अहसास
सहला के गई गेसुओं को प्यार से
कि रात काटनी होगी मेरे स्पर्श बिन

गर्म तेज हवाएं वजूद के साथ  ही
चलती हैं परछाइयों  के  संग संग
रेशमी हवाओं का तसव्वुर काफी है
बची सासों  के तरन्नुम के लिए

शरद कुमार  श्रीवास्तव  

सोमवार, 19 फ़रवरी 2018

मधुमास गीत

अलि तुम आली से कहना यहाँ  मधुमास आया है
चहकती हैं यहाँ  कलियाँ  भ्रमर दल पास आया है
हवाओं में गुलाबी ठंडक है, फिजा में मस्ती छाई है
खेतों से भीनी भीनी खुशबू अभी सरसों की आई है

नई कोपल नई किसलय विटप पर रौनक  छाई है
गया संग शीत के पतझड़, सूखे पत्ते हैं पेड़ों के नीचे
आली छुपके से आना तुम यहाँ  न आंखों को  मीचे
मचेगा शोर उपवन में अनंग का छल छद्म छाया है

अलि तुम सखी से कह दो यहाँ  मधुमास आया
तितलियाँ यहाँ चंचल कलियों का राज छाया है
बागों में प्रणय स्वर गुंजित है, सुघड़ और मधुकर
आली को दे देना यह संदेश जरा  झाड़ी में छुपकर

सखी है उस पार पर्वत के, गिरि पे बर्फ पिघली है
नदियों में कलकल जल जहाँ से सरिता निकली है
ग्रीष्म, वर्षा से पीड़ित  वन वहाँ  भी रौनक छाई है
अलि तुम आली से कह दो सुगन्धित  पाती आई है

सबों  का ऋतुराज मौसम यह, जामुन आम बौराया
कोयल पिक् आदि पक्षी का मधुर  स्वर है  लहराया
इधर हाला उधर टेसू पलाश  होली का  रंग गहराया
अलि तुम आली से कहना यहाँ  मधुमास है  आया

शरद कुमार  श्रीवास्तव








रविवार, 18 फ़रवरी 2018

आदमी की परिभाषा




तस्वीर में दुश्वारियां हैं तू ना जाने कौन है
पुमंग  का रूप धारे  खड़ा क्यों मौन है
दर्प है या पीड़ा कुछ भी समझ आता नहीं
वृक्ष सा तन कर खड़ा प्रश्न बन भाता नहीं

स्पर्श में कोमल मनोहर जरा एहसास हो
दर्द कोसों दूर भागे फिर सुगंधित वास हो
लहलहाती सी हवा छूू कर जाती है तुझे
तस्वीर में खूबसूरत सी महक आती मुझे

दर्द सारे है समेटे उफ नहीं करता मगर
लोगों को तस्वीर में दर्प आता है नजर
तन कर रहना प्रकृति  पर, अकड़  नहीं
आदमी है आदमी में ये मुझे आता नजर

शरद कुमार श्रीवास्तव

पुमंग=Androecium

दास्तान

मैं अंधेरे में रहा तुम अचानक खो गए
ढूंढ़ता हूं फिर रहा ख्वाब सारे सो गए
रात के लम्हे भी ख़ामोश सारे हो गए
चुप रहा मै मगर बदनाम तारे हो गए

चांदनी औ उल्फत मेरी यूं अचानक खो गई
दिन ख्यालों में बीता फिर अमावस हो गई
अब ना आएगी पलट, रात भर सोचा किया
मेरे तस्सवुर में ख्वाब से सारे नज़ारे हो गए

किसी तरह  कट रहा  जिंदगी का  ये सफर
चांद बस उम्मीद है जिसमें आएगी तू नजर
दूर जाना मुझ से तेरा अब सहा जाता नहीं
क्या कहूं कैसे कहूं मुझसे कहा जाता नहीं


शरद कुमार श्रीवास्तव


बसंती गीत




भ्रमर तुम गीत गाते प्रणय का राग सुनाते हो
मधुर गीतों को भर  मदिर  झंकार सुनाते हो
भरे रंग हर मौसम में ये उनकी ही  कहानी है
बसंत जब रंग लाता तुम उसमे  डूब जाते हो
बसंत में अनंग  संगसंग  तुम भी आये हो
फ़िज़ा मे  है मस्ती  जवानी खेतों में है छाई
नादान कलियाँ भी मदिर गीतों से हैं बौराई
छुपाते हो क्यों  सनम से मिल केआये  हो
उन्होंने तुमको भेजा  है वे खुद नहीं  आये
आना मुश्किल था  भेजा मदन  को  क्यों
सारे तीर तरकश के हमपर  छोड़ता रहता
नशा उससे सदा जेहन पर छाया सा रहता
सन्देशा ही  सहारा है जिसे छुपाये जाते हो `
महा ज्ञानं से भरपूर  संदेशा ले के आते हो
तेरा सनम सगुण है निर्गुण भी वही ही है
भला वो तुझसे दूर या तुझसे जुदा भी है
भ्रमर काले तुम तुम्हारा दिल भी है काला
प्रेम को समझेगा जो हो  प्रेम में मतवाला
समेटो ज्ञान की पोथी हमें बस सनम लादो
वो मोहन अपना कृष्ण बंसी बज्जैया लादो
उसको बतलादो  ये बस बिनती हमारी है
हमें न चैन मिलता है प्रीत की  बीमारी है
भ्रमर जो रूप उद्धव का सखा महाज्ञानी हैं
उन्होंने भी ज्ञान पर जीत प्रेम की मानी है
शरद कुमार श्रीवास्तव

सोमवार, 1 जनवरी 2018

आप आये बहार आयी




महफिल में आप आये  बहुत  अच्छा
बहारों से नगमा लाये  बहुत  अच्छा
गुनगुनाने की आदत नहीं  थी मुझमे
मेरे तराने सुरताल पाये बहुत अच्छा

आसमा में  टंके थे चान्द सितारे तब भी
अब हमको भी नजर आए बहुत अच्छा
वक्त के  साथ  हालात भी बदल जाते  हैं
ये घड़ी कुछ और थम जाये बहुत अच्छा

मुरझाए फूल खिल गए ओस की बूँदों से
लौट आयी खिजां में बहार बहुत अच्छा
रश्क मैं तुम पे करूं या करूं किस्मत पे
चलो तुम जरा  मुस्कराये  बहुत अच्छा

शरद कुमार  श्रीवास्तव