रविवार, 12 नवंबर 2017

रश्के आरजू




तेरे  इश्क  के जुनून में  रश्क किये  रहा हूँ  मै
तेरी बेरुखी में  गमे अश्क  पिये जा रहा हूँ  मै
जिन्दगी  के खुशनुमा बोसों ने तर कर दिया मुझे
सबों के होते हुए तन्हाइयाँ पिये जा रहा हूँ  मै

मै जानता हूँ तू मिलेगा, मेरी  जुस्तजू  कम नहीं
ऐसा  नहीं  है  कि मेरे हाल की  तुझे खबर नहीं
औरों की  इबादत क्या मुझसे तौल मे बढ़ के है
लगता है कि  मेरे इश्के जुनून पर तेरी नजर नही

आऊंगा तेरे दर पे समेट के जिन्दगी  की  नेमतें
ये न कहना तेरे असबाब  की  खबर न थी  मुझे
रश्क करता हूँ अपने जनून पर हर वक्त  मै मगर
चाहत भरे दिल में मेरे तू जरा सा गुरूर भी न दे

शरद कुमार  श्रीवास्तव

गुरुवार, 9 नवंबर 2017

जीने की तमन्ना



ऐ जिन्दगी  मैं  तुझसे  कितना  प्यार   करता हूँ
हर पल मै मरता हूँ और मर के फिर जी जाता हूँ

हर मुकाम पे साहिल का नजारा दीख  पडता है
तैर कर खुद जिंदगी की मौज में गोते लगाता हूँ

जिन्दगी ही मौज है हर मौज मे नई जिन्दगी है
यह सोच के साहिल से जरा दूर से कतराता हूँ

यह इल्म है कि किनारे पे जब मै पहुंच जाऊंगा
जिन्दगी  की  रौनक मे फिर आने  नहीं  पाऊँगा

वो जो तैर कर पार हुए  साहिल के  उस तरफ
झांक सकते नही जिन्दगी  में वापस इस तरफ

ख्वाहिश तमन्ना  इच्छाएँ जोर देती हैं जीने  को
इसीलिये शायद मैं  जिंदगी में  डूबता उतराता हूँ

शरद कुमार  श्रीवास्तव 

बुधवार, 8 नवंबर 2017

मजबूरी



है प्यार भी खफा खफा
इकरार भी हुआ  दफा
वक्त के सारे अफसाने है
हम अब भी तेरे दीवाने है

अर्सा हुआ तुमको मनाते
आखिर कोई बात बताते
खफा होने के कोई माने हैं
हम अब भी  तेरी दीवाने हैं

कई बार तुम्हें बताया  था
लाख मजबूरी बताया था
फिर आप क्यों  रूठ गये
लो गये गये हम गये गये

अभी थोड़ा सा  झमेला है
काम  का ही  रेलम पेला है
आडिट भी अब आया है
सिर भी  मेरा चकराया है

 तुम मुझको तो माफ करो
अपने मन को  साफ करो
समय के ये  बस तराने हैं
हम अब भी तेरे दीवाने हैं

शरद  कुमार  श्रीवास्तव








गुरुवार, 2 नवंबर 2017

कठपुतली

सूर्य के  रथ के  घोड़े
अंबराम्भ के इस पार
से अंबरांत तक जाते
पूरा दिन बीत  जाता

आसमान के उसपार
के देवता  को आराम
नहीं,  बड़ी परिधि का
नियंत्रक है। इस लिये

मात्र घर के भीतर हाँफ
जाते  हम । इधर उधर
उठा  पटक दौड़ धूप के
बूता नहीं रहता बिल्कुल

पर बड़ी परिधि वाला वो
संचालित करता है एकाकी
सूरज के सातों घोड़ों को
हमको आपको दुनिया को

लेखक निर्देशक सूत्रधार वो
यहाँ तक अकेला दर्शक भी
हम तो बस उसके हाथों में
खेलती हुई मात्र कठपुतली

शरद कुमार  श्रीवास्तव