शनिवार, 17 जुलाई 2021

करोना से जंग




खिड़की खुली रखना आएंगी  हवाएं 
सासें तुम्हारी तुुम्हे दे जाएंंगी दुआएं
अंतस् को जरूरी खुशनुमा  फिजाएं
ताजा प्राणदायनी शुद्ध साफ हवाएँ

मास्क बनाएगा सांसो पर कड़ा पहरा
करोना का  आतंक अभी तक है ठहरा
नाच रही हैं बेखौफ जालिम की सदाएं 
ख्यालो मे पसरी कल की गन्दी  हवाएं  

लम्बी जंग लड़ा, कर कुछ और शगल
कुछ देर ठहर जा कुछ  तू और संभल
तीसरी शय से लड़ने की है सब तैयारी
हमने वैक्सीनो की पूरी फौज है उतारी


कोरोना अब हारेगा इन्ही तदबीरों से
लडाई छिड गई काम नहीं तकदीरों से
जंग छिड़ ही गई है बस आगे बढो ना
जीत तुम्हारी  होगी  तुुम और डरो ना


शरद कुमार श्रीवास्तव 
















गुरुवार, 15 जुलाई 2021

इश्के -रब

 मुद्दतें लग गईं उन्हें मनाने मे

कहाँ रह गए किस जमाने मे

मोहब्बतें कम न होती उनसे 

बढ़ी है खलिश हर फसाने मे


बामुश्किल काबू किया दिल 

बेकरारी मे सराबोर था दिल

नामुमकिन था भूलना उनको

हुआ नाशाद यह हमारा दिल


इस कदर मारा है बेवफाई ने

झकझोर दिया तेरे फसाने ने 

उम्रदराज इश्किया अफसाना

बुतां इबादत  का टकरा जाना

 

खैर जो होना है अब हो जाय

खुदाए इश्क रहबर हो जाए 

दो रोज  मयस्सर हैं शायद

इश्के- रब सराबोर हो जाए



शरद कुमार श्रीवास्तव 


मंगलवार, 13 जुलाई 2021

आषाढ मास

अभी तो चमन मुर्झाए हुए हैं
 विटप सूने से  झुलसाए हुए हैं
फूल तरु पर खिलते नहीं हैं
विहगदल भी मिलते नहीं है

अरुणिमा तप्त है बीमार है
आषाढ़ की ये भिनसार है
सप्तहय झूझते है सुबह से
संहार की मंशा हो अभी से

पर पथिक राह मे है न अकेला
क्षुधा की आग को सबने झेला 
भूख की परिधि व्यापक बड़ी है
तप्तनभ मे और  तनके खड़ी है


श्रमिक वणिज वित्त या किसान
गर्मी लेती है सबका  इम्तिहान
 सिक्कों की चमक ही है ऐसी
चलते रहते पंखे कूलर व ए सी

श्वेत मेघ-दल आते चले जाते हैं
धरती की प्यास  बढ़ा जाते हैं
जा रहे हैं सागर से ये गागर भरने
श्रावण मे झरने लगेंगे नीर झरने

आश्वस्त  हो ग्रीष्म-पीड़ा घटेगी
तप्तनभ के आक्रोश को रहेगी 
वारिद की फुहार खेतों मे पडेगी
नई आशाओं से धरती खिलेगी


शरद कुमार श्रीवास्तव