विटप सूने से झुलसाए हुए हैं
फूल तरु पर खिलते नहीं हैं
विहगदल भी मिलते नहीं है
अरुणिमा तप्त है बीमार है
आषाढ़ की ये भिनसार है
सप्तहय झूझते है सुबह से
संहार की मंशा हो अभी से
पर पथिक राह मे है न अकेला
क्षुधा की आग को सबने झेला
भूख की परिधि व्यापक बड़ी है
तप्तनभ मे और तनके खड़ी है
श्रमिक वणिज वित्त या किसान
गर्मी लेती है सबका इम्तिहान
सिक्कों की चमक ही है ऐसी
चलते रहते पंखे कूलर व ए सी
श्वेत मेघ-दल आते चले जाते हैं
धरती की प्यास बढ़ा जाते हैं
जा रहे हैं सागर से ये गागर भरने
श्रावण मे झरने लगेंगे नीर झरने
आश्वस्त हो ग्रीष्म-पीड़ा घटेगी
तप्तनभ के आक्रोश को रहेगी
वारिद की फुहार खेतों मे पडेगी
नई आशाओं से धरती खिलेगी
शरद कुमार श्रीवास्तव
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