मंगलवार, 13 जुलाई 2021

आषाढ मास

अभी तो चमन मुर्झाए हुए हैं
 विटप सूने से  झुलसाए हुए हैं
फूल तरु पर खिलते नहीं हैं
विहगदल भी मिलते नहीं है

अरुणिमा तप्त है बीमार है
आषाढ़ की ये भिनसार है
सप्तहय झूझते है सुबह से
संहार की मंशा हो अभी से

पर पथिक राह मे है न अकेला
क्षुधा की आग को सबने झेला 
भूख की परिधि व्यापक बड़ी है
तप्तनभ मे और  तनके खड़ी है


श्रमिक वणिज वित्त या किसान
गर्मी लेती है सबका  इम्तिहान
 सिक्कों की चमक ही है ऐसी
चलते रहते पंखे कूलर व ए सी

श्वेत मेघ-दल आते चले जाते हैं
धरती की प्यास  बढ़ा जाते हैं
जा रहे हैं सागर से ये गागर भरने
श्रावण मे झरने लगेंगे नीर झरने

आश्वस्त  हो ग्रीष्म-पीड़ा घटेगी
तप्तनभ के आक्रोश को रहेगी 
वारिद की फुहार खेतों मे पडेगी
नई आशाओं से धरती खिलेगी


शरद कुमार श्रीवास्तव 
 





 



 





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