बुधवार, 22 मई 2024

राब्ताए इश्क: कुछ अश-आर

 फरियाद की न हमने दर्द की, तुमसे न कोई किया  गिला ।

 मेरी कशिश बरकरार रही राब्ताए इश्क का न सिला मिला ।।

वो जख्म जो कल तक थे हरे, नासूर पुराने बन गए ।

न फिक्र थी मेरे दर्द की, उन्हे मरहम करे  उन्हे सिये ।।

 

बन्दगी दुआ तेरी जुस्तजू, तर्ज ए इश्क पर मै किये चला ।

लोगो ने निगाह मोड ली कोई इधर चला या उधर चला ।।

फलक तक पड़ी मेरी नज़र, हर सूं रब दिखे जुदा  जुदा ।

कशिश थी जिसके दीदार की वह दिखा नहीं  मेरा खुदा ।।


तपिश  शरारों की न हुई दफन , खलिश बदस्तूर ,  बिला कफन ।

मेरा इश्क है तेरी जुस्तजू , तेरी आरजू तेरी लगन ।।

हर शक्स मे तस्वीर ढूँढता फिर रहा यार की ।

जिसे खबर नही परवाह नही मेरे प्यार की

।।



शरद कुमार  श्रीवास्तव