फरियाद की न हमने दर्द की, तुमसे न कोई किया गिला ।
मेरी कशिश बरकरार रही राब्ताए इश्क का न सिला मिला ।।
वो जख्म जो कल तक थे हरे, नासूर पुराने बन गए ।
न फिक्र थी मेरे दर्द की, उन्हे मरहम करे उन्हे सिये ।।
बन्दगी दुआ तेरी जुस्तजू, तर्ज ए इश्क पर मै किये चला ।
लोगो ने निगाह मोड ली कोई इधर चला या उधर चला ।।
फलक तक पड़ी मेरी नज़र, हर सूं रब दिखे जुदा जुदा ।
कशिश थी जिसके दीदार की वह दिखा नहीं मेरा खुदा ।।
तपिश शरारों की न हुई दफन , खलिश बदस्तूर , बिला कफन ।
मेरा इश्क है तेरी जुस्तजू , तेरी आरजू तेरी लगन ।।
हर शक्स मे तस्वीर ढूँढता फिर रहा यार की ।
जिसे खबर नही परवाह नही मेरे प्यार की
।।
शरद कुमार श्रीवास्तव