शुक्रवार, 29 दिसंबर 2017

जिन्दगी


मेरी  जिन्दगी मुझसे यूं दामन न छुड़ा
पहलू मे मेरे बैठ जरा मेरे पास तो आ
तू हसीं है जवां दिलो की  चाहत है
पर तुझसे मेरे दिल को भी राहत है

जिन्दगी जीने की  तमन्ना  कम न होगी
मौत की चौखट पे भी यह कम न होगी
कभी कम कभी एकदम गायब होती ये
फिर यकायक रूबरू हो जाती जिन्दगी

जिन्दगी  पाने की इच्छा जगी फिर दिल मे
 फिर और  जीने  की चाहत  जगी दिल मे
आरजू  है जिन्दगी  से यूं  दामन  न छुड़ा
पहलू मे मेरे  बैठ जरा मेरे  पास तो आ

शरद कुमार  श्रीवास्तव 

शनिवार, 2 दिसंबर 2017

ओ बन्धु रे कुछ तो बोल


ओ बन्धु रे कुछ तो बोल
अपनी मन की गाठें खोल
डरा डरा  क्यों तू है बोल
ओ बन्धु रे कुछ तो बोल

दिग दिगान्त शान्त हुए
तू क्यों है दिग्भ्रांत प्रिये
समय की महिमा महान
यह काल बड़ा  बलवान

शाम गभीर बदली छाई
जाने रात कब घिर आई
रात होगी तो दिन होगा
यह बस तू मन में तोल

नवदिन का आगाज कर
नहीं रात से अब तू डर
ओढ़ के सो सपने प्यारे
स्वर्णिम से स्निग्ध न्यारे

अब बन्धु कुछ तो बोल
अपनी मन की गाठें खोल
डरा डरा  क्यों तू है बोल
ओ बन्धु रे कुछ तो बोल






हम साथ चले,  हम गले  मिले, कहने  को  जमाने बीत गये
एक साथ थाली मे खाए  पल, जीवन के सफर में  बीत गये

साथ साथ साइकिलों मे रेस लगाते कालेज  जाते हम दोनों
साथ साथ  घर  में भी खेलते-पढते हुए  जमाने बीत गये

समय के नेपथ्य  मे, लोग हुए वीराने, तुम क्यों रूठ गये
कालेज शहर मोहल्ले जाने क्या क्या हमसे देखो छूट गये
बहुत खोया बहुत था पाया यादे गुजरी रातो को  लूट गये
चौदह वर्ष  बहुत होते हैं  जब तुम हम सबसे थे रूठ गये

शरद कुमार  श्रीवास्तव




रविवार, 12 नवंबर 2017

रश्के आरजू




तेरे  इश्क  के जुनून में  रश्क किये  रहा हूँ  मै
तेरी बेरुखी में  गमे अश्क  पिये जा रहा हूँ  मै
जिन्दगी  के खुशनुमा बोसों ने तर कर दिया मुझे
सबों के होते हुए तन्हाइयाँ पिये जा रहा हूँ  मै

मै जानता हूँ तू मिलेगा, मेरी  जुस्तजू  कम नहीं
ऐसा  नहीं  है  कि मेरे हाल की  तुझे खबर नहीं
औरों की  इबादत क्या मुझसे तौल मे बढ़ के है
लगता है कि  मेरे इश्के जुनून पर तेरी नजर नही

आऊंगा तेरे दर पे समेट के जिन्दगी  की  नेमतें
ये न कहना तेरे असबाब  की  खबर न थी  मुझे
रश्क करता हूँ अपने जनून पर हर वक्त  मै मगर
चाहत भरे दिल में मेरे तू जरा सा गुरूर भी न दे

शरद कुमार  श्रीवास्तव

गुरुवार, 9 नवंबर 2017

जीने की तमन्ना



ऐ जिन्दगी  मैं  तुझसे  कितना  प्यार   करता हूँ
हर पल मै मरता हूँ और मर के फिर जी जाता हूँ

हर मुकाम पे साहिल का नजारा दीख  पडता है
तैर कर खुद जिंदगी की मौज में गोते लगाता हूँ

जिन्दगी ही मौज है हर मौज मे नई जिन्दगी है
यह सोच के साहिल से जरा दूर से कतराता हूँ

यह इल्म है कि किनारे पे जब मै पहुंच जाऊंगा
जिन्दगी  की  रौनक मे फिर आने  नहीं  पाऊँगा

वो जो तैर कर पार हुए  साहिल के  उस तरफ
झांक सकते नही जिन्दगी  में वापस इस तरफ

ख्वाहिश तमन्ना  इच्छाएँ जोर देती हैं जीने  को
इसीलिये शायद मैं  जिंदगी में  डूबता उतराता हूँ

शरद कुमार  श्रीवास्तव 

बुधवार, 8 नवंबर 2017

मजबूरी



है प्यार भी खफा खफा
इकरार भी हुआ  दफा
वक्त के सारे अफसाने है
हम अब भी तेरे दीवाने है

अर्सा हुआ तुमको मनाते
आखिर कोई बात बताते
खफा होने के कोई माने हैं
हम अब भी  तेरी दीवाने हैं

कई बार तुम्हें बताया  था
लाख मजबूरी बताया था
फिर आप क्यों  रूठ गये
लो गये गये हम गये गये

अभी थोड़ा सा  झमेला है
काम  का ही  रेलम पेला है
आडिट भी अब आया है
सिर भी  मेरा चकराया है

 तुम मुझको तो माफ करो
अपने मन को  साफ करो
समय के ये  बस तराने हैं
हम अब भी तेरे दीवाने हैं

शरद  कुमार  श्रीवास्तव








गुरुवार, 2 नवंबर 2017

कठपुतली

सूर्य के  रथ के  घोड़े
अंबराम्भ के इस पार
से अंबरांत तक जाते
पूरा दिन बीत  जाता

आसमान के उसपार
के देवता  को आराम
नहीं,  बड़ी परिधि का
नियंत्रक है। इस लिये

मात्र घर के भीतर हाँफ
जाते  हम । इधर उधर
उठा  पटक दौड़ धूप के
बूता नहीं रहता बिल्कुल

पर बड़ी परिधि वाला वो
संचालित करता है एकाकी
सूरज के सातों घोड़ों को
हमको आपको दुनिया को

लेखक निर्देशक सूत्रधार वो
यहाँ तक अकेला दर्शक भी
हम तो बस उसके हाथों में
खेलती हुई मात्र कठपुतली

शरद कुमार  श्रीवास्तव


शनिवार, 21 अक्टूबर 2017

राजू जीवन एक सफर पर प्रतिक्रियाएं




नमन आदरणीय 🙏😊
सर्वप्रथम क्षमा चाहूँगी बहुत समय बाद मैंने आपका उपन्यास *राजू  जीवन एक सफर* पढ़ी। कुछ घरेलू कारण कुछ पहले से ही एक दो उपन्यास शुरू किए हुए उन्हें पूरा करना था इसी कारण देर हुई 🙏* राजू जीवन एक सफर* एक ऐसा उपन्यास है जो शुरू करने के बाद खत्म किये बिना छोड़ने का जी नही हुआ। ऐसा काफी समय बाद हुआ है कि किसी उपन्यास को एक साँस में पढ़ती चली गई । हालांकि इसमें शब्दो की कोई जादूगरी नही सरल सहज शब्दो मे लिखी गयी एक कहानी एक निम्न आय वर्ग के बच्चे के जुझारू जीवन की कहानी बिना लाग लपेट सहज अभिव्यक्ति फिर भी  पाठक को अंत तक बांधे रखने में सक्षम है । अंत तक जिज्ञासा चरम पर रही आगे क्या होगा। केवल निम्न आय वर्ग की कठिनाईयो को ही नही उग्रवाद जैसे विषय को काफी तर्कपूर्ण तरीके स्व दर्शाया गया है इसमें । सच ही है जितनी विषम  परिस्थिति यो से गुजरने के बाद भी नायक का जो सशक्त चरित्र उभर कर सामने आता है वो प्रेरणा का काम करता है । इस उपन्यास के लिए हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाये ☺,🙏

नेह सुनीता







...
प्रणाम बाबूजी !
वैसे तो कहानी , उपन्यास पढ़ना सर्विसेस में व्यस्तता के कारण बहुत कम हो गया था । बहुत दिनों बाद आपका उपन्यास #राजू_जीवन_एक_सफर " पढ़ने को मिला ।
उपन्यास को पढ़ने के दौरान यह महसूस होता गया कि इसमें जीवन के मार्मिक , संघर्ष , जीवटता और सम्वेदनशीलता को विषय में बड़ी ही रोचकता से प्रस्तुत हुआ है , जो पाठक को बांधे रखती है ।  विषय समसामयिक और गम्भीर है लेकिन बहुत ही सरल शब्दों और छोटे- छोटे शब्दों से स्पष्ट किया है ... पढ़ने के दौरान अपनी पृष्टभूमि जैसा ही महसूस हुआ ।
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राजू , सरला , मन्नू , मौसाजी , सावित्री , लल्ली , शर्माजी , रमन , मीरा , रमेश ,कृपानिधि पाण्डेय , हलदर साहब , माधुरी , विमला और अंत में महत्वपूर्ण चरित्र शोभा सभी शानदार पात्र है ... बहुत ही जीवन्त पात्र रचना है आपके । साथ ही सभी परस्पर सकारात्मकता [ positivity ] के साथ अपने चरित्र के साथ न्याय करते है ।
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राजू की कहानी एक निम्न मध्यम वर्गीय बच्चे की संघर्ष की कहानी है , जो बचपन में मानसिक और शैक्षणिक समस्याओं को जूझता हुआ अपने आत्मबल और कड़ी परिश्रम से जीवन में आगे बढ़ता है । ईमानदारी और उत्तरदायित्व की भावना से एक सार्थक लक्ष्य को प्राप्त करता है । परिस्थियों से जबरदस्त तरीके से सामन्जस्य बिठाना काबिले तारीफ है ।
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उपन्यास में ग्रामीण- शहरी सन्तुलन , सामन्जस्य का बड़ा सूक्ष्म वर्णन, उग्रवाद जैसे ज्वलन्त मुद्दों को भी उकेरा है ।
सरला और सावित्री जैसी सशक्त , मातृभाव , जीवटता वाली चरित्र ने नारी के महत्वपूर्ण गुणों को प्रभावी चित्रण हुआ है ।
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सावित्री का ममत्त्व , राजू का कठोर परिश्रमी , निष्ठावादी , शोभा का आंतरिक संघर्ष , मौसा जी , रमन का सहयोगी भावना , मीरा का अपनत्व  बहुत ही सुंदर और मर्मशील तत्व है जो उपन्यास को सरस और रोचक बनाते है ।💖💞
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#राजू : जीवन का सफर " ... पढ़कर जीवन के प्रति कुछ बिन्दुओ पर दृष्टिकोण में सकारात्मक परिवर्तन महसूस हुआ । पूरा उपन्यास सकारात्मकता [ positivity ] से भरा है , जो मन में सुकून के भाव जगाते है । 👌
...
बहुत आनन्द और सुकून मिला इस रचना को पढ़कर ।
धन्यवाद आपका !
यू ही अपने विचारो को निरन्तर गतिशील रखिये ताकि आपके अनुभवो से हमे भी राह , मार्गदर्शन और प्रेरणा मिले बाबा ।
सादर प्रणाम बाबूजी । 👏👏
....
KK वर्मा , रायपुर 😊
~~~~~~


 मेरी एक अवधी रचना

निर्गुन

संझा के बादे अंधेरिया, अब का करिबे बाबू

खाली  है हमरी ढिबरिया हम का करिबे बाबू

समय काल रहत, सब सुध बुध हम गंवायेन

बंद भई सारी बजरिया , अब का करिबे बाबू



संझा के बादे अंधेरिया, हम का करिबे बाबू

तार तार  हमरी चुनरिया, हम का ओढबै  बाबू

बिन ओढे चुनरिया सब किरुआ हमका कटिहैं

ओढके राम-नामी चदरिया, हम सो जइबे बाबू

शरद कुमार  श्रीवास्तव

बुधवार, 18 अक्टूबर 2017

एक प्रेम गीत




तुम  ही  मेरी शायरी तुम  ही गीत  गजल  हो
तुम  ही मेरी मीत भी तुम  ही प्यार  अचल हो
तुम ही मेरे सुरों  मे सजीं मेरी  रागनी सरल हो
दिल पे  तेरा  राज है जादूगरनी रूप विमल हो

मेरी अराधना  तुम्ही से है  पूजा अविरल हो
तेरी रंजिश मुझे सहन नहीं जैसे तेज गरल हो
तुम  ही  मेरी शायरी तुम  ही गीत  गजल  हो
तुम  ही मेरी मीत भी तुम  ही प्यार  अचल हो

शरद कुमार  श्रीवास्तव




बुधवार, 11 अक्टूबर 2017

आनंद के पल



आनंद  के पल

उडने को है तैयार  परिन्दे

कुछ हँस  ले  कुछ  गा ले

चार पल  आनन्द मना ले

सुर सजा और गीत गा ले

माना हम अब है शाम ढली

राह कठिन अंधियारी गली

क्यों चिन्ता करता है परिन्दे

क्यों निराशा तेरे मन में पली


डाल पे  बैठकर सुर मिलाले

कुछ  हँस  कर  कुछ  गा ले

हर पल बस आनंद  मना ले

जीवन  का हर आनंद उठा ले

पहले थे दिन रात मनोहर

खट्टे मीठे रसदार मनोहर

उन्हें  याद करके  तू पंछी

निज चैन, मत- हर मत- हर

आयगी अब रात मनोहर

शीतल चांद यामिनी सुन्दर

मृदु राग घोलती अंबर पर

आ जा सुर मे सुर मिलाले

समय की लडी के  मोती

चुन नव स्वप्न  सजा  ले

चिंताओं  से बाहर  होकर

जीवन का  आनंद  मना ले

शरद  कुमार  श्रीवास्तव








शुक्रवार, 6 अक्टूबर 2017

दीदार



समायी  रहती है तू मेरे  खयालों  मे, तेरे जलवों  की  बात होती  है
दिखाई  देती नहीं मुझको  फिर भी  , बन्द आखों मे  पास होती है।

 तुम तो  रहती हो मेरे  खयालों  मे, तेरे जलवों  की  बात होती  है खलिश मे जलता रहा उम्र भर यूं ही अब रिहाई की  बात होतीं  है

कोई  कब तक  जलेगा और तपिश मे भला तेरी  मोहब्बत के  लिए
 जख्मों पर रखने के  लिए तेरी नजर के एक फाहे  की बात होती  है

इबादत  नही है कोई जरिया कोई इल्म नही है  मुझे अब  इश्किया
झुकी जाती  है शर्म से नजरें , दीदारे- यार  मेरे दिल के पास होतीं है

शरद कुमार  श्रीवास्तव


  

शनिवार, 23 सितंबर 2017

दावा




बादलों के रुख से हवा कह रही हैं
कुछ रंजिश भरी जुबां कह रहीं हैं
हवाएं सर्द हों गर्म हों बहती रहेगी
परिन्दो की गुफ्तगू चलती रहेगी

रेल, मेट्रो में भीड़ आती जाती  रहेगी
याद मेरी तुमको हरदम आती रहेगी
ढूंढते रहेंगे नैन रुमाल देती वो बाहे
मुस्कुराती प्यार की दिलकश अदाएं

सच है धुरी पर घूमती रहेगी दुनिया
धूप या फिर चांदनी बिखेरती दुनिया
दुनिया के भुलावे में  सो भी जाओगे
दावा है मेरा तुम मुझे भुला न पाओगे

शरद कुमार श्रीवास्तव

बुधवार, 13 सितंबर 2017

समय







वक्त से गिला
क्या करें कोई अब-
बदली हवा

दिखा रही हैं
अपनी  ये अदाएं -
शोख हवाएं 

कभी धीरे से
फुसफुसा जारही-
कर्ण प्रिय सा

मधुर धुन
से मिश्रित  संगीत-
मधु यामिनी

सब्र का पाठ
या तपती धूप में
लेकर छाता

प्यार का फाहा
समय ही लगाता
ज़ख्मी दिल पे

समझौता क्यों
न करो समय से
वह मर्मग्य

यह वक्त  ही
जाने दर्द तुम्हारा
हमेशा से ही

शरद कुमार  श्रीवास्तव 

शनिवार, 9 सितंबर 2017



छुपा खजाना

वस्तुत: मेरी दिवंगत पत्नी श्रीमती वीना श्रीवास्तव की मृत्यु के नौ वर्ष बाद उनकी लिखी कुछ  भावपूर्ण  रचनाएँ  मिली हैं जिन्हें मैं यहां प्रस्तुत कर रहा हूं और उन रचनाओं की श्रंखला  का नाम मैंने " छुपा खजाना" रखा है।

शरद  कुमार  श्रीवास्तव


पहली कहानी

जड़

घनघोर  अंधेरा  था ।  रात्रि  का  प्रथम  पहर  था ।  हाथ  को  हाथ तक सुझाई नहीं दे रहा  था । ऐसी नीरवता  में हवा  ने पास खड़े  एक विशाल  वृक्ष  पर जोर से दस्तक दी ।  दस्तक  सुनकर पेड़  के  सभी  भाग हिल गये और अचम्भे में  एक  दूसरे  को  देखते  रह गये ।   परन्तु  जड़  बेचारी  ने  पेड़  के  सभी  भागों  को  पूरी  ताकत से  जमीन  के  साथ  बांधे  रखा था ।  वह नहीं  चाहती थीं  कि  पेड़  का कोई  भाग  भी आहत हो ।  वह जानती  थी  कि  सभी भागों को  उसने   एक दूसरे  से  बांध  रखा  था  ।  इनमें  से  किसी  के  बिना  भी  पेड़  का अस्तित्व  ही  कहां  है ।

इस संसार में   दूसरों  की  महत्ता  समझने  वाले  कम ही होते  हैं  ।   सभी  अपने आप   को  एक से  बढ़कर  एक,   महान  समझते  हैं।  ऐसा  ही  कुछ  इस  विशाल  वृक्ष  के भागों  के   बारे  में  भी  था ।  तना  फूल  पत्ती  शाखें  फल सभी  अपनी अपनी   महत्ता  एक  से  बढ़कर  एक   मानते  थे ।   सुबह  सुबह  ही  जब  मन्द  हवा थपकी  देती थी  तो  पत्तियाँ  अपना अलग   राग अलापती हुई अपने  को  धन्य  मानतीं थीं ।  वे सोचती  थी कि  वृक्ष  की  सारी सुन्दरता  का  श्रेय  उन्हीं  को  है ।  वे ही तो पेड़  को  छायादार  बनाती हैं ।  पक्षियों  को  नीड़  बनाने  का  स्थान  देती हैं ।  पत्तियों  का  हरा  रंग  आकर्षण  का  केंद्र  बनता  है  ।

रंग  बिरंगे  फूल अपने  चटकीले  रंग  देखकर  प्रसन्न  हो  रहे  हैं ।
वे सोचते  हैं  कि  उनके कारण  ही  तो वृक्ष की  शोभा  है ।  मुझे  लेकर  लोग  मन्दिर  गिरजे, घरो को  सजाते  मुझे  भगवान्  के   पर फूल और मालाएँ   चढाते हैं ।   लोगों का  स्वागत  भी  फूल  मालाओं से  करते हैं  और  मनुष्य  की  मृत्यु  के  बाद शव पर भी फूल और मालाएँ   चढाते  हैं । अतः  पेड़  का  महत्वपूर्ण  अंग मैं  ही हूँ ।
  फूल अपनी मस्ती  मे थे कि पत्तियों के ओट से फलों  ने  झांका और अपने  को महान  बताते   हुए और हवा  में  लहराते  हुए  सोंच  रहा था कि  वह मनुष्य  पशु  पक्षियों को   मीठे मीठे  फल  खिलाकर वह उन  सबकी भूख मिटाता है ।  उससे ही नये बीज निकलते  हैं  और नये  पेड़  बनते हैं,   अतः  वह श्रेष्ठ  है ।   वृक्ष के  दूसरे  हिस्से  'तना ' और शाखाएँ  भी एक  से  बढ़कर  एक  अपने  गुणों  का  बखान  करके  श्रेष्ठ  होने  का दावा  कर रही थीं   कि  उनकी  वजह  से  पेड़  का  अस्तित्व  है ।   इस तरह  पेड़  के  सभी  भाग  झूम कर अपने अपने  महत्व को  प्रकट  करने  की  कोशिश  कर  रहे  थे   परंतु   जड़ बेचारी धरती  के भीतर  पड़ी  हुई पेड़ के    सभी भागों  का बोझ  उठाए हुए जमीन  के  नीचे  पड़ी  हुई   थी ।   वह  तो  आम बस  अपना  काम  करने में लगी हुई थी  उसके मन में इस  बात के लिए  कोई  शिकायत नहीं थी  की वह पूरे   वृक्ष के लिए अन्न जल  पहुँचाने ,पूरे पेड़ का बोझ सँभालने के काम कर रही   हैं। वह अपना काम बहुत तल्लीनता से किये जा रही थी

इसी प्रकार कई दिन  बीत गए ।  अचानक  एक दिन  दोपहर में कुछ लोग आये ।    रस्सी, कुल्हाड़ी और आरी   से उन दरिन्दो ने   पूरा पेड़ काट डाला।   देखते देखते  तना,शाखें पत्ते  फूल और फल ज़मीं पर आ गिरे ।   पेड़ के  किसी भाग में यह हिम्मत नहीं थी कि वे उन लोगों का विरोध करते।  उसे लग  रहा था कि उसके  अलावा   वृक्ष  के अन्य  सभी  भाग एक घमण्ड  में चूर थे और  उनकी उन लकड़हारों  के सामने  एक  न चली



   सच ही कहां गया है  कि  कभी   गर्व   नहीं करना चाहिए।   पल भर में कुछ भी हो सकता है।   वे लोग  जो विनर्म  हैं  उनका सदैव  भला ही होता है।

वीणा  श्रीवास्तव


बुधवार, 23 अगस्त 2017

दीर्घ स्थाई शाम



अब यह शाम भी लम्बी  खिंची जाती है
 मुँह मे पडे चिंगंम जैसी चलती ही जाती है
पहले तो ऐसा होता ही नहीं था कभी भी
शाम तो  जल्दी-जल्दी ही सरक जाती थी

अब तो परछाइयाँ  भी लम्बी  खिंच गईं
अपने साथ  गहरा सन्नाटा  बिखेर गई
 पहले तो ऐसा  होता  ही नहीं था कभी भी
सरेशाम रात  की गोद  में  सो जाते थे

यह शाम की लम्बाई  और पसरा एकान्त
उबाऊ यात्रा  अंबारम्भ से अम्बरांत तक
सूरज के रथ में  जुते घोड़ों सा विश्राम हीन
अपनी काया को  सहेजे,करे रात का इंतजार

शरद कुमार  श्रीवास्तव 

मंगलवार, 9 मई 2017




अनुभूति

ठहरे हुए जीवन मे भी  तरंगें
अंतर ध्वनित कंपन से उठती
या जगाती हैं अंतस का कंपन
परिपूरक चेतना  सी ध्वनित

ज्वार भाटा सी न हो  तो  भी
तरंगे तो उठती रहती हैं  सदा
हवा के स्पर्श से विचलित  हो
जीवन का एहसास  दिलाती

कंपित, तरंगित  अनुभूतियाँ
पाषाणों के पास भी तो  है
भूगर्भ की  निर्जीव शिलाओं  की
अनुभूतियाँ ही लाती हैं भूदोलन

शरद  कुमार  श्रीवास्तव 

रविवार, 26 मार्च 2017



प्रेमपत्र

प्रेमपत्र लिख भेज  रहा हूँ  
प्रिये अगर स्वीकार हो
मेरे कहने की बात नहीं 
तुमको भी गर प्यार हो 

जल्दबाजी की बात नहीं 
फूलों को रखो फुर्सत से 
दिल गर बेकाबू भी हो तो 
इकरार करो जी फुर्सत से

मत देखो तुम मेरी काया
न लट न बिखरे केशों को
मन मैंने सोने सा बनाया
न देखो मेरे आवेशों को

तुमको भी हो मुझको  भी
तब तो फिर  इनकार नहीं 
मत कह देना मुझसे तुमतो
मुझ को तुमसे  प्यार  नहीं 

शरद कुमार  श्रीवास्तव

शुक्रवार, 3 मार्च 2017

झटका भला

झटका  भला

ठहरे पानी सा जीवन  
ऊबने लगा है ये मन
कतार में खड़ा हुआ
हलाल  होने  के  लिए
निरीह  पशु के  जैसा
व्यर्थ  पुकार  लगाता
नकेल 'समय' के  पास
रेतना कब शुरू करेगा
कुछ पता नही चलेगा
सलीब पर पूछी जाती
अंतिम इच्छा कैदी की
 यहाँ नहीं!  न दया ही
धार दार छूरी आहिस्ता
आहिस्ता ही फिरती रहेगी
वक्त  के  साथ! झटका  भला  



बुधवार, 1 मार्च 2017

बासंती सुबह


ऊषा  की नई किरण लेके
बसंत का मौसम  आया
नव प्रभात के स्वागत से
दृग तृप्त हुए मन हर्षाया
 विलुप्त हो गई सारी  धुंध
पतझड़ का क्षण बीत गया
ऊषा की किरणें  आने से
रात्रि  प्रहर अब बीत गया

झांकते नव पल्लव तरु से
देख उन्हें मेरा मन हर्षाया
कोमल कोपलें सजी धजी
देख विटप मन शरमाया

तृण शिखरों पे चमक रहे
हैं हीरक कण शुभ्र-धवल
सुरभित मंद हवा बह रही
थिरकती कलिकाएं नवल

फैला हुआ है कलियों का
सौंदर्य, ये बसंत है आली
बह रही हवा दिगंतों तक
मधुर मदिर मादक वाली

हैं पत्ते भी पेडों पे झूम रहे
पा झोंके मस्त हवाओं के
निर्मल आकाश बिछा हुआ
स्वागत नई फिजाओं के

पिक सुक कोकिला भी तो
वृक्ष पे मधुर गीत सुनाते हैं
मधुमास के  सब रंगों  में
निज सुन्दर रंग  मिलाते हैं


शरद  कुमार  श्रीवास्तव












सोमवार, 27 फ़रवरी 2017




2 मार्च 2014 को वीनापति मे प्रकाशित मेरी रचना 

रात      

 ( हाइकु लेखन शैली मे 17 वर्णों की माला मे रचित)

रात आती है
सुबह आने तक
रुक जाती है

मै चाहता हूँ
कभी रात नहीं हो
सुबह ही हो

ठंडी शीतल
केवल सुबह हो
अविरल हो

मन्द बयार
ताज़ी निर्मल धूप
खुशहाल सी

तुमने देखा
रात ठहर गई
एक भय से

मेरी इच्छित
कामनाओं से डर
इसे लगता

ये बात है तो
पूरी रात जागूँगा
स्पर्धा में ही

अच्छा ही होता
रात आती ही नहीं
किसी के पास

दीर्घ स्थायी
विरहाकुल काली
बदनुमा सी

शरद कुमार श्रीवास्तव

सोमवार, 20 फ़रवरी 2017




वीनापति मे 18 फरवरी 2014 को प्रकाशित मेरी एक रचना

फरियाद

गये कहाँ हो छोड़कर मुझे कुछ पता नहीं
भटक रहा डगर मगर तेरा कुछ पता नहीं
बाल-पन में आये तुम, रहे सदा छाये तुम
दूध की कटोरी में, माता की लोरी में तुम 
खिलोने में दिखे सदा, चाँद से सलोने तुम
बालकथा में छाये थे, हर जगह समाये तुम
ढूंढता हूँ भटक रहा जाने कहाँ गये हो तुम
फिर रहा इधर उधर तेरा कुछ पता नहीं

गये कहाँ हो छोड़कर  मुझे कुछ पता नहीं
भटक रहा डगर मगर तेरा कुछ पता नहीं
जवानी जब आयी तो मस्ती रही छाई जो
दिल में इक उफान था जोश था तूफ़ान था
सवाल ही सवाल था तुम्हारा ना ख़याल था
नशा रहा ज़रा ज़रा तुमसे हांथ लिया छुड़ा
जाने मैं किधर गया तुम्हारा कुछ पता नहीं
भटक रहा डगर मगर तेरा कुछ पता नहीं

तूने मुझे बताया था कभी गले लगाया था
याद करोगे आऊंगा, प्यार तुझे जताऊंगा
राह में मैं पड़ा हुआ याद तुम्हे ही कर रहा
करूं अब  क्या भला जाने तू किधर गया
फेंट बिसरी यादो को समेटकर फरियादों को
भूले हुए सब वादों को बटोर सारी बातों को
गुबार तो निकाल दूं  एक ख़त मैं डाल  दूं
पर क्या तेरा नाम दूं किस पते पे डाल दूं

शरद कुमार श्रीवास्तव

बुधवार, 18 जनवरी 2017

आज की  गजल 
गजल के लिये  इक हंसीं तस्वीर होना चाहिए  
तासीर भी अच्छी गजल की यह जरूरी  नहीं 
गजल मामूल भी हो तो  चल जाएगी  जरूर 
 बशर्ते तस्वीर में हसीना शोख होना  चाहिये 

ये जमाना और है, फेसबुक वाट्सअप का दौर है
चल नहीं सकती कोई इबारत गौर होना चाहिये 
लिख सकते तो लिखो किताबों मे बेशक लिखो 
पढ़ने के लिये फरिश्ते भी तो और होना चाहिये 

शरद कुमार  श्रीवास्तव 

नींद
नींद  मुझको  आ रही  उसको नमन
खलिश घटती  जा रही  उसको नमन
यादों का जलजला  था उसको नमन
लगातार सिलसिला था उसको नमन

बदलती हुई करवटें थीं  उनको नमन
बिस्तर पे पड़ी सिलवटें  उनको नमन
ऐ मेरे एकाकीपन अब तुमको  नमन
नींद  मुझको  आ रही उसको नमन

पड गई  जो नींद मुझको न जगाना
भूली बिसरी यादों  मेरे पास न आना
बमशक्कत पड़ी है  नींद उसको नमन
घट रही  है अब खलिश उसको नमन



धुंध 

धुंध  कहो या
चाहे कुछ  और  ही
इसके  लिये

आखों  की  जोत
को लगा  है  ग्रहण
दीखता  कम

उम्र  के नाम
यह धुंधलापन
हल्की हैं  छबि

रास्ते  के  लिए
चश्मा और छड़ी  भी
रोड के  कुत्ते

घर में एक
ऐनक लगाये हैं
पढ़ने  हेतु

लेकिन  मुझे
साफ दिखाई  देती
तेरी  प्रतिमा

या आने वाला
घनघोर अंधेरा
सन्निकट ही

भूली बिसरी
यादों  के चेहरे  भी
इन्हीं  आँखों  से  

शरद  कुमार  श्रीवास्तव