शनिवार, 2 दिसंबर 2017


हम साथ चले,  हम गले  मिले, कहने  को  जमाने बीत गये
एक साथ थाली मे खाए  पल, जीवन के सफर में  बीत गये

साथ साथ साइकिलों मे रेस लगाते कालेज  जाते हम दोनों
साथ साथ  घर  में भी खेलते-पढते हुए  जमाने बीत गये

समय के नेपथ्य  मे, लोग हुए वीराने, तुम क्यों रूठ गये
कालेज शहर मोहल्ले जाने क्या क्या हमसे देखो छूट गये
बहुत खोया बहुत था पाया यादे गुजरी रातो को  लूट गये
चौदह वर्ष  बहुत होते हैं  जब तुम हम सबसे थे रूठ गये

शरद कुमार  श्रीवास्तव




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