ठहरे पानी सा जीवन
ऊबने लगा है ये मन
कतारबद्ध खड़ा हुआहलाल होने के लिए
निरीह पशु के जैसा
व्यर्थ पुकार लगाता
नकेल समय के पास है
रेतना शुरू हो गया है
तिल तिल भर रुक रुक कर
सलीब पर पूछी जाती
अंतिम इच्छा कैदी की
अभी नहीं! न बाद मे भी, बस
धार दार छूरियाँ, आहिस्ता
आहिस्ता, हर बार फिरती रहेगी
पतझड़ का इंतजार करते रहो
शायद सुनवाई हो और
सूखा पत्ते को मोक्ष मिल जाए
शरद कुमार श्रीवास्तव