गुरुवार, 7 मार्च 2024

सूखा पत्ता

 ठहरे पानी सा जीवन  

ऊबने लगा है ये मन

कतारबद्ध खड़ा हुआ

हलाल  होने  के  लिए

निरीह  पशु के  जैसा

व्यर्थ  पुकार  लगाता

 नकेल  समय के पास है 

 रेतना शुरू हो गया है

तिल तिल भर रुक रुक कर


सलीब पर पूछी जाती

अंतिम इच्छा कैदी की

 अभी नहीं!  न बाद मे भी, बस

धार दार छूरियाँ, आहिस्ता

आहिस्ता, हर बार फिरती रहेगी

 पतझड़  का इंतजार करते रहो

शायद सुनवाई  हो और

सूखा पत्ते को मोक्ष मिल जाए

 

शरद कुमार श्रीवास्तव 

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