शनिवार, 23 सितंबर 2017

दावा




बादलों के रुख से हवा कह रही हैं
कुछ रंजिश भरी जुबां कह रहीं हैं
हवाएं सर्द हों गर्म हों बहती रहेगी
परिन्दो की गुफ्तगू चलती रहेगी

रेल, मेट्रो में भीड़ आती जाती  रहेगी
याद मेरी तुमको हरदम आती रहेगी
ढूंढते रहेंगे नैन रुमाल देती वो बाहे
मुस्कुराती प्यार की दिलकश अदाएं

सच है धुरी पर घूमती रहेगी दुनिया
धूप या फिर चांदनी बिखेरती दुनिया
दुनिया के भुलावे में  सो भी जाओगे
दावा है मेरा तुम मुझे भुला न पाओगे

शरद कुमार श्रीवास्तव

बुधवार, 13 सितंबर 2017

समय







वक्त से गिला
क्या करें कोई अब-
बदली हवा

दिखा रही हैं
अपनी  ये अदाएं -
शोख हवाएं 

कभी धीरे से
फुसफुसा जारही-
कर्ण प्रिय सा

मधुर धुन
से मिश्रित  संगीत-
मधु यामिनी

सब्र का पाठ
या तपती धूप में
लेकर छाता

प्यार का फाहा
समय ही लगाता
ज़ख्मी दिल पे

समझौता क्यों
न करो समय से
वह मर्मग्य

यह वक्त  ही
जाने दर्द तुम्हारा
हमेशा से ही

शरद कुमार  श्रीवास्तव 

शनिवार, 9 सितंबर 2017



छुपा खजाना

वस्तुत: मेरी दिवंगत पत्नी श्रीमती वीना श्रीवास्तव की मृत्यु के नौ वर्ष बाद उनकी लिखी कुछ  भावपूर्ण  रचनाएँ  मिली हैं जिन्हें मैं यहां प्रस्तुत कर रहा हूं और उन रचनाओं की श्रंखला  का नाम मैंने " छुपा खजाना" रखा है।

शरद  कुमार  श्रीवास्तव


पहली कहानी

जड़

घनघोर  अंधेरा  था ।  रात्रि  का  प्रथम  पहर  था ।  हाथ  को  हाथ तक सुझाई नहीं दे रहा  था । ऐसी नीरवता  में हवा  ने पास खड़े  एक विशाल  वृक्ष  पर जोर से दस्तक दी ।  दस्तक  सुनकर पेड़  के  सभी  भाग हिल गये और अचम्भे में  एक  दूसरे  को  देखते  रह गये ।   परन्तु  जड़  बेचारी  ने  पेड़  के  सभी  भागों  को  पूरी  ताकत से  जमीन  के  साथ  बांधे  रखा था ।  वह नहीं  चाहती थीं  कि  पेड़  का कोई  भाग  भी आहत हो ।  वह जानती  थी  कि  सभी भागों को  उसने   एक दूसरे  से  बांध  रखा  था  ।  इनमें  से  किसी  के  बिना  भी  पेड़  का अस्तित्व  ही  कहां  है ।

इस संसार में   दूसरों  की  महत्ता  समझने  वाले  कम ही होते  हैं  ।   सभी  अपने आप   को  एक से  बढ़कर  एक,   महान  समझते  हैं।  ऐसा  ही  कुछ  इस  विशाल  वृक्ष  के भागों  के   बारे  में  भी  था ।  तना  फूल  पत्ती  शाखें  फल सभी  अपनी अपनी   महत्ता  एक  से  बढ़कर  एक   मानते  थे ।   सुबह  सुबह  ही  जब  मन्द  हवा थपकी  देती थी  तो  पत्तियाँ  अपना अलग   राग अलापती हुई अपने  को  धन्य  मानतीं थीं ।  वे सोचती  थी कि  वृक्ष  की  सारी सुन्दरता  का  श्रेय  उन्हीं  को  है ।  वे ही तो पेड़  को  छायादार  बनाती हैं ।  पक्षियों  को  नीड़  बनाने  का  स्थान  देती हैं ।  पत्तियों  का  हरा  रंग  आकर्षण  का  केंद्र  बनता  है  ।

रंग  बिरंगे  फूल अपने  चटकीले  रंग  देखकर  प्रसन्न  हो  रहे  हैं ।
वे सोचते  हैं  कि  उनके कारण  ही  तो वृक्ष की  शोभा  है ।  मुझे  लेकर  लोग  मन्दिर  गिरजे, घरो को  सजाते  मुझे  भगवान्  के   पर फूल और मालाएँ   चढाते हैं ।   लोगों का  स्वागत  भी  फूल  मालाओं से  करते हैं  और  मनुष्य  की  मृत्यु  के  बाद शव पर भी फूल और मालाएँ   चढाते  हैं । अतः  पेड़  का  महत्वपूर्ण  अंग मैं  ही हूँ ।
  फूल अपनी मस्ती  मे थे कि पत्तियों के ओट से फलों  ने  झांका और अपने  को महान  बताते   हुए और हवा  में  लहराते  हुए  सोंच  रहा था कि  वह मनुष्य  पशु  पक्षियों को   मीठे मीठे  फल  खिलाकर वह उन  सबकी भूख मिटाता है ।  उससे ही नये बीज निकलते  हैं  और नये  पेड़  बनते हैं,   अतः  वह श्रेष्ठ  है ।   वृक्ष के  दूसरे  हिस्से  'तना ' और शाखाएँ  भी एक  से  बढ़कर  एक  अपने  गुणों  का  बखान  करके  श्रेष्ठ  होने  का दावा  कर रही थीं   कि  उनकी  वजह  से  पेड़  का  अस्तित्व  है ।   इस तरह  पेड़  के  सभी  भाग  झूम कर अपने अपने  महत्व को  प्रकट  करने  की  कोशिश  कर  रहे  थे   परंतु   जड़ बेचारी धरती  के भीतर  पड़ी  हुई पेड़ के    सभी भागों  का बोझ  उठाए हुए जमीन  के  नीचे  पड़ी  हुई   थी ।   वह  तो  आम बस  अपना  काम  करने में लगी हुई थी  उसके मन में इस  बात के लिए  कोई  शिकायत नहीं थी  की वह पूरे   वृक्ष के लिए अन्न जल  पहुँचाने ,पूरे पेड़ का बोझ सँभालने के काम कर रही   हैं। वह अपना काम बहुत तल्लीनता से किये जा रही थी

इसी प्रकार कई दिन  बीत गए ।  अचानक  एक दिन  दोपहर में कुछ लोग आये ।    रस्सी, कुल्हाड़ी और आरी   से उन दरिन्दो ने   पूरा पेड़ काट डाला।   देखते देखते  तना,शाखें पत्ते  फूल और फल ज़मीं पर आ गिरे ।   पेड़ के  किसी भाग में यह हिम्मत नहीं थी कि वे उन लोगों का विरोध करते।  उसे लग  रहा था कि उसके  अलावा   वृक्ष  के अन्य  सभी  भाग एक घमण्ड  में चूर थे और  उनकी उन लकड़हारों  के सामने  एक  न चली



   सच ही कहां गया है  कि  कभी   गर्व   नहीं करना चाहिए।   पल भर में कुछ भी हो सकता है।   वे लोग  जो विनर्म  हैं  उनका सदैव  भला ही होता है।

वीणा  श्रीवास्तव