बादलों के रुख से हवा कह रही हैं
कुछ रंजिश भरी जुबां कह रहीं हैं
हवाएं सर्द हों गर्म हों बहती रहेगी
परिन्दो की गुफ्तगू चलती रहेगी
रेल, मेट्रो में भीड़ आती जाती रहेगी
याद मेरी तुमको हरदम आती रहेगी
ढूंढते रहेंगे नैन रुमाल देती वो बाहे
मुस्कुराती प्यार की दिलकश अदाएं
सच है धुरी पर घूमती रहेगी दुनिया
धूप या फिर चांदनी बिखेरती दुनिया
दुनिया के भुलावे में सो भी जाओगे
दावा है मेरा तुम मुझे भुला न पाओगे
शरद कुमार श्रीवास्तव
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