सोमवार, 1 नवंबर 2021

अव्यक्त स्वप्न

 


मेरे उर मे 

तैरता  अनंत सा

एक शब्द 


अनेक शब्द 

भावों मे डूब कर

गति पा चुके 



ये  एकाकी ही

तैर रहा उर मे

अनुत्तरित 

 

उससे पूछा

मेरे अकथ शब्द

अभी हो यहीं

 

यक्ष की भाँति 

तुम वहीं के वहीं

अनसुने से

 

मेरे सपने

पानी पे रेखा से

 अव्यक्त बने


शरद कुमार श्रीवास्तव