शनिवार, 3 मार्च 2018

बसंत की सुबह

ऊषा  की नई किरणे लेके
बसंत का मौसम  आया
नव प्रभात के स्वागत से
दृग तृप्त हुए मन हर्षाया

लो लुप्त हुई है चहुँओर धुंध
पतझड़ का क्षण बीत गया
ऊषा की किरणें  आने से
रात्रि  प्रहर अब बीत गया

झांकते नव पल्लव तरु से
देख उन्हें मेरा मन हर्षाया
कोमल कोपलें सजी धजी
देख विटप मन शरमाया

तृण शिखरों पे चमक रहे
हैं हीरक कण शुभ्र-धवल
सुरभित मंद हवा बह रही
थिरकती कलिकाएं नवल

फैला हुआ है कलियों का
सौंदर्य, ये बसंत है आली
बह रही हवा दिगंतों तक
मधुर मदिर मादक वाली

हैं पत्ते भी पेडों पे झूम रहे
पा झोंके मस्त हवाओं के
निर्मल आकाश बिछा हुआ
स्वागत नई फिजाओं के

पिक सुक कोकिला भी तो
वृक्ष पे मधुर गीत सुनाते हैं
मधुमास के  सब रंगों  में
गाकर सुन्दर रंग  मिलाते हैं

शरद  कुमार  श्रीवास्तव

शुक्रवार, 2 मार्च 2018

रेशमी एहसास







शब भर इन्तज़ार करता  रहा
रेशमी  हवाओं  की दस्तक का
कारवाँ धूल भरी गर्दिश का था
गुजरे लम्हों के  संग बीत गया

आ गया इस नायाब से गुलशन में
कैक्टस संग जुम्बिश करता हुआ  मै
जख्म भरे पैर और कांटों से याराना
न कोई उफ़, शिकवा की  गुलशन से

अभी अभी  तो गई है भिनसार से
ख्यालों में आई हुई रेशमी अहसास
सहला के गई गेसुओं को प्यार से
कि रात काटनी होगी मेरे स्पर्श बिन

गर्म तेज हवाएं वजूद के साथ  ही
चलती हैं परछाइयों  के  संग संग
रेशमी हवाओं का तसव्वुर काफी है
बची सासों  के तरन्नुम के लिए

शरद कुमार  श्रीवास्तव