शब भर इन्तज़ार करता रहा
रेशमी हवाओं की दस्तक का
कारवाँ धूल भरी गर्दिश का था
गुजरे लम्हों के संग बीत गया
आ गया इस नायाब से गुलशन में
कैक्टस संग जुम्बिश करता हुआ मै
जख्म भरे पैर और कांटों से याराना
न कोई उफ़, शिकवा की गुलशन से
अभी अभी तो गई है भिनसार से
ख्यालों में आई हुई रेशमी अहसास
सहला के गई गेसुओं को प्यार से
कि रात काटनी होगी मेरे स्पर्श बिन
गर्म तेज हवाएं वजूद के साथ ही
चलती हैं परछाइयों के संग संग
रेशमी हवाओं का तसव्वुर काफी है
बची सासों के तरन्नुम के लिए
शरद कुमार श्रीवास्तव
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