शुक्रवार, 2 मार्च 2018

रेशमी एहसास







शब भर इन्तज़ार करता  रहा
रेशमी  हवाओं  की दस्तक का
कारवाँ धूल भरी गर्दिश का था
गुजरे लम्हों के  संग बीत गया

आ गया इस नायाब से गुलशन में
कैक्टस संग जुम्बिश करता हुआ  मै
जख्म भरे पैर और कांटों से याराना
न कोई उफ़, शिकवा की  गुलशन से

अभी अभी  तो गई है भिनसार से
ख्यालों में आई हुई रेशमी अहसास
सहला के गई गेसुओं को प्यार से
कि रात काटनी होगी मेरे स्पर्श बिन

गर्म तेज हवाएं वजूद के साथ  ही
चलती हैं परछाइयों  के  संग संग
रेशमी हवाओं का तसव्वुर काफी है
बची सासों  के तरन्नुम के लिए

शरद कुमार  श्रीवास्तव  

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