सोमवार, 4 अक्टूबर 2021

यकीनो मे रब

 



रश्के मोहब्बत का  इजहार रब्बा

तेरे मेरे प्यार का, इश्तेहार  रब्बा

गुलों में रंगत खिली खिली सी है

चमन मे और भी हैं कद्दार रब्बा


वफा का इम्तिहान मुझे नहीं देना

जहाँ को इत्मीनान मुझे नही देना

 तेरे और मेरे बीच का मामला है

तुम्हे तो है मुझ पर ऐतबार  रब्बा

 


खौफशुदा होकर हम नही झुकते

इश्क और मुश्क छुपाए नही छुपते

कोई रंज मे हो भले या खफा कोई 

कैसे दर्शाए भला अपनी वफा कोई


मेरे यकीनो मे रब का गुमा होता है

घूप मे सुन्दर शब का गुमा होता  है

एकाकी रात हो कि बेहद तन्हाई

पास है तू, सुकूं का गुमा  होता है


शरद कुमार श्रीवास्तव 






शनिवार, 2 अक्टूबर 2021

निशा-सुन्दरी

वक़्त के साथ निशा सुन्दरी तेरा रूप निखरता जा रहा है

अधखुले नेत्र- मदिरालय मे आतुर मन लपकता आ रहा है

ढल रहा है चाँद क्षितिज मे चाँदनी मद्धिम होती जा रही है

बालिका सी सो रही जिन्दगी की लौ धीमी  होती जा रही है


निर्धारित है ये नियत प्रणय, आलिंगन का है ये पल रूपसी

घनपाश मे आ पकड़ जकड मिटे हृदय शूल की बेकसी

जो भी है यह पल है केवल, स्वर्णिम क्षण, सिमटा जा रहा

प्रज्वलित लौ हे दीपशिखा की, दीप क्षण मे बुझने जा रहा


चकित  भ्रमित मत कर मुझको देवालय के सब दीप बुझे

न कोई अर्जी मर्जी की चलने वाली क॔ठस्वर भी हुए रुंधे

खोल  जरा अवगुंठन अब तू, दूरी को अब मिट जाने दे

प्यासा कंठ तृप्त  जरा कर चिरप्यास जरा मिट जाने दे



शरद कुमार श्रीवास्तव