वक़्त के साथ निशा सुन्दरी तेरा रूप निखरता जा रहा है
अधखुले नेत्र- मदिरालय मे आतुर मन लपकता आ रहा है
ढल रहा है चाँद क्षितिज मे चाँदनी मद्धिम होती जा रही है
बालिका सी सो रही जिन्दगी की लौ धीमी होती जा रही है
निर्धारित है ये नियत प्रणय, आलिंगन का है ये पल रूपसी
घनपाश मे आ पकड़ जकड मिटे हृदय शूल की बेकसी
जो भी है यह पल है केवल, स्वर्णिम क्षण, सिमटा जा रहा
प्रज्वलित लौ हे दीपशिखा की, दीप क्षण मे बुझने जा रहा
चकित भ्रमित मत कर मुझको देवालय के सब दीप बुझे
न कोई अर्जी मर्जी की चलने वाली क॔ठस्वर भी हुए रुंधे
खोल जरा अवगुंठन अब तू, दूरी को अब मिट जाने दे
प्यासा कंठ तृप्त जरा कर चिरप्यास जरा मिट जाने दे
शरद कुमार श्रीवास्तव
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