कुछ हाइकु
कड़ी धूप मे
ठंडा कूल आभास-
धूप का चश्मा
हमसफर
छायादार वृक्ष हैं
श्वेत गगन
झरोखे मे बैठ
निहारती सुन्दरी
अमलतास
लाठी पकड़े
निस्तेज वृद्ध तन
लम्बी छलांग
शरद कुमार श्रीवास्तव
कुछ हाइकु
कड़ी धूप मे
ठंडा कूल आभास-
धूप का चश्मा
हमसफर
छायादार वृक्ष हैं
श्वेत गगन
झरोखे मे बैठ
निहारती सुन्दरी
अमलतास
लाठी पकड़े
निस्तेज वृद्ध तन
लम्बी छलांग
शरद कुमार श्रीवास्तव
देवलोक की कन्दरा मे ठिठुर रही थी रात
घाटी को चीर उगा दिन वहीं अकस्मात।।
उत्तुंग शीश पर शोभित विराट रजत किरीट
क्षण को भर लूँ उर मे मैं, पल जा रहा है बीत।।
होड़ लगाई मेघों ने भी छेड़ दिया अनुराग
उसकी भी सुन तो लो मचा दिया शिशुराग।।
द्रवित हुआ नभ एकदम बरसी सभी दिशाएं
थमी बदन की ताप प्रणाली कंपित हुईं शिराएं।।
आग तापते छाते और चिलम संग अधनंगे संत
भक्तो की लम्बी कतार का कहीं न मिलता अंत
जय केदार- जय केदार कंठनाद अप्रतिम उद्घोष
प्रभु दर्शन करने जाने का रहा सभी जनो मे जोश
नभ मे ईश मानस मे ईश्वर परिवेश सदा से ईश्वर मय
केदारनाथ ही है परमपिता देवलोक सदा परमेश्वर मय
शरद कुमार श्रीवास्तव
शरद कुमार श्रीवास्तव
नभ जल कलकल हिम जल कलकल
गिरि से अवरोहित कलकल छलछल
नवयौवना सरिता की अल्हड़ कलकल
गिरि से उतर रही वेग भरी चंचल चंचल।।
मस्ती है इसका महामंत्र हरपल प्रतिपल
मस्ती ही परिसीमन बस चलती कलकल
राहें हों टेढी तिरछी हों बाधा से भले बिछी
जंगल नगर है राग एक मृदु मंगल छलछल ।।
बहता जल है केवल निर्मल, रुकेजरा तो दूषित जल
संदेश दे रही मानव जन को, बढ़ो सदा विमल विमल
रुको नहीं बस चले चलो चाहे कितनी भी बाधा हो
सलिला देती संदेश सदा मधुर राग कलकल छलछल
शरद कुमार श्रीवास्तव
जेठ की दुपहरी मे
ठांव दे रहा बटवृक्ष
दिन मे शीतल छांव
और सांसो को सांस
शाखाओ को बिखेरे
स्वागत करता हर पल
बटोही तनिक ठहर तू
विश्राम कर फिर जाना
मै बादलो को रोक रहा
खड़ा अकेला एकाकी
मानव की पिपाषा मे
कट रहे वृक्ष पर वृक्ष
तुम एक वृक्ष लगाओगे
धरा की प्यास बुझाओगे
प्रश्न है पर जटिल नहीं
एक संकल्प करो बस
शरद कुमार श्रीवास्तव