लक्ष्य को भेदित नित
दैनिक अभ्यास
इच्छा, नई ऊंचाइंया ।
नया परिसीमन
नया लक्ष्य फिर बोरियत
असीमित, अलक्षित ।।
घर के कमरों
की सीमांत लकीरें
पसरी अजगर सी।
इधर से उधर
उधर से इधर
इसी परिसीमन मे ।
किसने खींचीं है
लकीरें अभेद्य
लक्ष्मण रेखा ।।
और मेरा भी
बाहर निकलने का
न इरादा न विचार ।
मन मे सिमटा भयानक
आवारा पशुओं सा भय
और सामने ढलती जिन्दगी ।।
शरद कुमार श्रीवास्तव