कुछ समय पहले
जेठ की एक सुबह
प्रगटा था तुम्हारा अवतार
तब बह रही थी
शीतल ठंडी हवा
मोहती मन
था स्वच्छ आकाश
निर्मल था गगन
अनुकूल वातावरण
सूर्योदय की
अरुणिमा भी थी
बिन बादल के
खुश थी दिशाएं
मदमस्त क्षितिज
गमका हुआ
पर सामने था
अग्निपथ विस्तृत
भीषण धूप
लू के थपेड़े
सूखे ताल-तलैये
न कोई ठौर
बेरोक टोक
स्वच्छन्द धुन पर
चलना था तुझे
आज भी वही
सामने है और
आने वाली है परीक्षा
घबरा मत बटोही
तू चलता जा
बस चलता जा
विजय को आना
ही होगा मिलने
युग पुरुष
शाम तलक
मंजिल आने तक
बटोही मन