बुधवार, 26 सितंबर 2018






कुछ समय पहले

जेठ की एक सुबह
प्रगटा था तुम्हारा अवतार
तब बह रही थी
शीतल ठंडी हवा
मोहती मन
था स्वच्छ आकाश
निर्मल था गगन
अनुकूल वातावरण

सूर्योदय की
अरुणिमा भी थी
बिन बादल के
खुश थी दिशाएं
मदमस्त क्षितिज
गमका हुआ

पर सामने था
अग्निपथ विस्तृत
भीषण धूप
लू के थपेड़े
सूखे ताल-तलैये
न कोई ठौर

बेरोक टोक
स्वच्छन्द धुन पर
चलना था तुझे

आज भी वही
सामने है और
आने वाली है परीक्षा
घबरा मत बटोही

तू चलता जा
बस चलता जा

विजय को आना
ही होगा मिलने
युग पुरुष

शाम तलक
मंजिल आने तक
बटोही मन

बुधवार, 5 सितंबर 2018



आसमानो से शहद है बरसा
पास में रजनीगंधा है महका
एकान्त के राग भी हैं सुरीले
मदमाते हुए प्याले से रसीले

वेदना के सुर हैं गम के सारे
आये जैसे हों छू देश तुम्हारे
हृदय श्रृंखला लो खनक उठी
सब तरफ तुम्हारी महक उठी

हर्ष- विषाद के सब फीके रस
शेष रह गया यह जीवन  बस
 पूस माघ की ये रात अंधियारी
सुरभित पर मन मे याद तुम्हारी

यह मेरी बेसब्र मेरी बेचैन निगाहें
ताकती आस्मां से आती हुई राहें
कतरा कतरा ओस जब बरसता है
खुश्बुए गेसू को ये मन तरसता है

शरद कुमार श्रीवास्तव