मंगलवार, 27 दिसंबर 2016


उम्मीद तन्हा तन्हा यह जिन्दगी बेतरतीब गुजर ही जाएगी यादों की माला टूट कर हाथों से बिखर जाएगी अपनी नज्मों गजलों की फिक्र तुम करते हो क्योंकर गैरों की कहे कौन, धीरसे अपनो से बिसर जायेगी इक उम्मीद थी कि उम्मीद पे है ये दुनिया कायम इस बेकार की उम्मीद से उम्मीद लगा बैठे हम यूँ तो मैने हर उम्मीद से कर लिया किनारा लेकिन किस उम्मीद पे कटे शामोसहर हो जीना मुमकिन मैने हर शब जाम मे डुबोया था खुद को इस कदर कि शब नाउम्मीदी मे न कटे, फलक से आये सहर मुझे रात की कालिख से डर बिल्कुल नहीं लगता बैठा हूँ कश्ती में किनारों पर है अब मेरी नज़र शरद कुमार श्रीवास्तव

शुक्रवार, 23 दिसंबर 2016

शिकवाए गजल याद आते गये हरसूं शाम के आ जाने मे जमाना बीत गया भूल न पाया भुलाने में तुम यादों की तहों में बसे रहते हो हर दम गेसुओ की खुश्बू जज्ब यादों के आशियाने मे तुम्हारा ही वजूद जेहन में समाया रहता है वर्ना अब बचा ही क्या है इस जमाने में शायद तुम मशगूल हो गए दूसरे वतन मे दो हरूफ खत तो भेजते अपने अफसाने में जानता हूँ बेगैरत रुसवाईयो का डर है तुमको स्याह सफेद कुछ कहते ख्वाबो के शामियाने मे ये मालूम है मेरी बात नहीं पहुँचेगी तुम तलक यहाँ हम,तुम हो मशरूफ किसी और जमाने में शरद कुमार श्रीवास्तव

गुरुवार, 22 दिसंबर 2016

शरारा तपिश तपिश ये खलिश खलिश हर पल तेरा ही खयाल है तेरी जुस्तजू इस कदर बढीं, गया दिल ,न कुछ मलाल है मेरा शौक तपिश मे जलना है मुझे आतिशों पे मचलना है बस शरारे यों ही उठे सदा तेरी आशिकी मे मुझे जलना है मेरी बन्दगी है न ये दिल्लगी, मेरे दिल मे लौ है लगी लगी हर साँस तेरा ही बस नाम ले, हर पल करूं मैं तेरी बन्दगी मेरी खाक हवा मे उड़े तो क्या ,ये तपिश फिजा मे बनी रहे मेरी रूह जिस्म से जुदा भी हो, ये आशिकी यों ही बनी रहे। शरद कुमार श्रीवास्तव
शून्य की गणित साथ में जब एक था तो शून्य भी अनेक था किसी के साथ रहने से ही हर अंक पे अनेकानेक था एक से थी उसकी ताकत एक से था उसका विश्वास एक ही से थी उसे मोहब्बत जीवन पलों का था आभास एक के जीवन से निकलते शून्य फिर सिफर रह गया जीवन के साथ का आंकड़ा एक के जाने से बिखर गया न रह गई अब वो ताकत किसी से भी पंगा ले सके शून्य की कहाँ अब हिम्मत शिकस्त किसी को दे सके किसी शून्य की ताकत फिर किसी के साथ मिलने में है। एक हो दो या कोई अंक हो उसका वजूद सिर्फ जुडने में है साथी, परिवार या समाज हो जोड़कर बनाए नये समीकरण शून्य स्वयं भी होगा मूल्यवान अंक का भी होगा नवमूल्याकन शून्य का एकाकी रहने का कोई भी मतलब ही नहीं है महाशून्य मे विलय होने से पूर्व जुड़ जाय किसी से ये सही है शरद कुमार श्रीवास्तव

बुधवार, 21 दिसंबर 2016

जर्जर कविता मै सोंचता हूँ एक कविता लिखूँ अतुकान्त तुकान्त जो भी लिखूँ अपने हृदय के पटल पर ही लिखूँ पोस्ट करूँ सार्वजनिक पटल पर पाने हेतु एक कमेन्ट और लाइक या कविताओं की पुस्तक बनाऊँ बुक शेल्फ पर धूल खाने के लिये अन्तोगत्वा मुन्नू कबाड़ी के लिये कोई क्यों पढ़ेगा ये सोने का मन पडोसी के पिल्ले को मिलते हैं सौ सौ कमेन्ट लाइक हजारों मे पास रिजर्व कविता की पोस्ट मे जर्जर हुई , बेचारी बूढ़ी काकी सी जूठे मे स्वाद ढूंढती आज कविता शरद कुमार श्रीवास्तव
शून्य की गणित साथ में जब एक था तो शून्य भी अनेक था किसी के साथ रहने से ही हर अंक पे अनेकानेक था एक से थी उसकी ताकत एक से था उसका विश्वास एक ही से थी उसे मोहब्बत जीवन पलों का था आभास एक के जीवन से निकलते शून्य फिर सिफर रह गया जीवन के साथ का आंकड़ा एक के जाने से बिखर गया न रह गई अब वो ताकत किसी से भी पंगा ले सके शून्य की कहाँ अब हिम्मत शिकस्त किसी को दे सके किसी शून्य की ताकत फिर किसी के साथ मिलने में है। एक हो दो या कोई अंक हो उसका वजूद सिर्फ जुडने में है साथी, परिवार या समाज हो जोड़कर बनाए नये समीकरण शून्य स्वयं भी होगा मूल्यवान अंक का भी होगा नवमूल्याकन शून्य का एकाकी रहने का कोई भी मतलब ही नहीं है महाशून्य मे विलय होने से पूर्व जुड़ जाय किसी से ये सही है शरद कुमार श्रीवास्तव

मंगलवार, 20 दिसंबर 2016

वर्ण पिरामिड

दूध ये दूध लाया है दूध वाला पानी मिला के जनता नल से हमें तो सिर्फ पीना है आज विलय समाज की जीवन शैली शुद्ध कुछ नही जलवायु दुग्ध भी शरद कुमार श्रीवास्तव

बुधवार, 14 दिसंबर 2016

मेरी प्रेयसी मेरी कविता

पाने को सब
करता है मन
लेकिन  पाकर
रखूँगा  कहाँ ?
हर जगह तो
तू ही  है समाई
दिल दिमाग सपने
सभी जगह तो है
तुम्हारा  सशक्त  वजूद
मेरे  सुख मे तू
दुख का  कारण  भी तू
अब न गढूँगा कोई  कहानी
बस तुझी मे समाएगा मेरा वजूद
बस तू ही तू है  मेरी प्रेयसी मेरी कविता 
जय ने अपने पापा की  फैक्ट्री  में  ही वह मूर्ति  पापा के  चैम्बर  में  ही  तो रखी थी ।  काफी समय से वह परेशान था ।  उसके पापा ने बहुत  ही  मेहनत  और मशक्कत से   

सोमवार, 5 दिसंबर 2016

कविता

पाती 

यादो के समुन्दर मे लहरे गिरती पड़ती रहती 
कोई तसवीर मुक्कम्मल नहीं रह पाती उसमे
रेत के टीले बनते बिगडते यादों के मरुथल मे
प्यार के हरियाली भरे वे बाग संजो नहीं पाते

बक्से के कोने मे पडी तेरे हाथ से लिखी पाती
पीली पड़ गई है पर बक्से के बाहर नही जाती
लिपटी तेरे प्यार के फूलो की महकती गंध मे
फुसला के ले जाती  भूले हुऐ सुहाने मंजर तक

उन लमहों, उन पलों तक जो न वापस होंगे
ले जाती है तेरी सौगात तेरी चिट्ठी मुझको
हाले दिल बयाँ कर जो पाती मे लिख भेजा था
एहतियातों से संजोया है तेरा दस्तावेज बहोत

दिल की बात दिल के कोने मे उठती फिर भी
सिर्फ पाती है कभी तुझ सी हो नहीं सकती
सागर के मोतियों सी उज्जवल  तेरी वो याद
आँखों की सीपियों मे संजोये रखता है ये मन
रचना 

शरद कुमार श्रीवास्तव

रविवार, 4 दिसंबर 2016

गणपतये  नमः

श्री गणेशाय
हे विध्नेश्वर
संकट  मोचन
लम्बोदराय नमो नमः