शुक्रवार, 23 दिसंबर 2016
शिकवाए गजल
याद आते गये हरसूं शाम के आ जाने मे
जमाना बीत गया भूल न पाया भुलाने में
तुम यादों की तहों में बसे रहते हो हर दम
गेसुओ की खुश्बू जज्ब यादों के आशियाने मे
तुम्हारा ही वजूद जेहन में समाया रहता है
वर्ना अब बचा ही क्या है इस जमाने में
शायद तुम मशगूल हो गए दूसरे वतन मे
दो हरूफ खत तो भेजते अपने अफसाने में
जानता हूँ बेगैरत रुसवाईयो का डर है तुमको
स्याह सफेद कुछ कहते ख्वाबो के शामियाने मे
ये मालूम है मेरी बात नहीं पहुँचेगी तुम तलक
यहाँ हम,तुम हो मशरूफ किसी और जमाने में
शरद कुमार श्रीवास्तव
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