बुधवार, 21 दिसंबर 2016

जर्जर कविता मै सोंचता हूँ एक कविता लिखूँ अतुकान्त तुकान्त जो भी लिखूँ अपने हृदय के पटल पर ही लिखूँ पोस्ट करूँ सार्वजनिक पटल पर पाने हेतु एक कमेन्ट और लाइक या कविताओं की पुस्तक बनाऊँ बुक शेल्फ पर धूल खाने के लिये अन्तोगत्वा मुन्नू कबाड़ी के लिये कोई क्यों पढ़ेगा ये सोने का मन पडोसी के पिल्ले को मिलते हैं सौ सौ कमेन्ट लाइक हजारों मे पास रिजर्व कविता की पोस्ट मे जर्जर हुई , बेचारी बूढ़ी काकी सी जूठे मे स्वाद ढूंढती आज कविता शरद कुमार श्रीवास्तव

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