जर्जर कविता
मै सोंचता हूँ एक कविता लिखूँ
अतुकान्त तुकान्त जो भी लिखूँ
अपने हृदय के पटल पर ही लिखूँ
पोस्ट करूँ सार्वजनिक पटल पर
पाने हेतु एक कमेन्ट और लाइक
या कविताओं की पुस्तक बनाऊँ
बुक शेल्फ पर धूल खाने के लिये
अन्तोगत्वा मुन्नू कबाड़ी के लिये
कोई क्यों पढ़ेगा ये सोने का मन
पडोसी के पिल्ले को मिलते हैं
सौ सौ कमेन्ट लाइक हजारों मे
पास रिजर्व कविता की पोस्ट मे
जर्जर हुई , बेचारी बूढ़ी काकी सी
जूठे मे स्वाद ढूंढती आज कविता
शरद कुमार श्रीवास्तव
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