रविवार, 21 अप्रैल 2024

युग प्रणेता

 युग प्रणेता


चले अकेले

एक प्रण लेकर 

कथा रचने


गढ़ने नये

इतिहास  का पृष्ठ 

स्वर्णिम युग 


लोहे की छेनी

हथौड़ा साधारण 

जन मानस


विचार उगे

अद्भुत  अनुपम

सोने का मृग


ये मारीचिका

करती दिग भ्रान्त 

भटका लक्ष्य


संभलकर 

कोद॔ड उठाकर 

आखेट कर


लिखो कहानी

जन मानस पर

फिर उठके


सीता हरण

नही हो फिर कभी

आजानबाहु



शरद कुमार श्रीवास्तव 




गुरुवार, 18 अप्रैल 2024

तीसरी दुनिया (संस्मरण 2)

 


आप माने तो देवता, नहीं तो पत्थर  वाली कहावत  तीसरी दुनिया के अस्तित्व  पर भी लागू होती है।  मै इस संस्मरण  मे आपको अविश्वसनीय   टोटकों के कुछ  किस्से सुनाने जा रहा हूँ आप  को न विश्वास  हो तो महज संयोग  ही समझ लीजिएगा  पर कहानियो  मे तीसरी दुनिया का वजूद पर एक दृष्टिपात अवश्य  कीजिएगा 

1  .    किसी की आखों मे बेलनी (Sty) निकल आना एक साधारण  सी बात है।  इसके कुछ  चिकित्सीय  उपचार  भी उपलब्ध  हैं ।   घरेलू उपचार  मे एक  टोटका प्रचलित  है जिसे बेलनी  से परेशान  लोग  अपनाते भी हैं ।  इसके लिए  प्रातःकाल  तड़केसुबह  भुक्तभोगी को अपने इलाके के नवनिर्माण कृत घर के पास  जाकर  उस  नवनिर्माण कृत घर को मुँह  चिढ़ाकर वापस  आना होता है ।  प्राय: देखा गया है कि आँखों की बेलनी इससे बैठ जाती है।


2  छोटे बच्चों को अक्सर  नजर लग जाती है । नजर सबसे ज्यादा अपनो की ही लगती है ।   कहते हैं कि बच्चों को अपने  माँ बाप की नजर ही पहले लगती है।   नजर  लगने से बचाव  के उपाय बाज़ार  मे उपलब्ध  है जैसे कि गले मे काले धागे मे सोने का बना "हाय", कमर मे बाँधने के लिए  कालेधागे की करधनी इत्यादि।   बच्चे के कान के पीछे काजल का टीका आदि बहुत  प्रचलित  है।

बच्चे को जिसे नजर  लग चुकी है ।   उस बच्चे को तुरन्त  राहत देने के लिए  एक  विशेष  टोटका प्रचलित  है जिसमे एक  सूखा मिर्चा बच्चे के ऊपर  से सात बार घुमाकर आग मे जलाए  जाने पर कोई महक नहीं आती है ऐसा कहा जाता है।

3 .  मेरे एक करीबी रिश्तेदार  के नवजात शिशु के जन्म के कुछ  दिन बाद उसकी नाभि एक  बडे टमाटर  की आकृति की हो गई थी ।   बच्चे के माता पिता संपन्न होते हुए  उन्होने उस बालक  को बड़े से बड़े डाक्टर  को दिखलाया शायद  आधुनिक  चिकित्सा मे इसका ऑपरेशन  था उस  नवजात  शिशु के माता पिता कि यह अंतिम पसंद  होती परन्तु एक ग्रामीण  टोटके से वह विकार शीघ्र  बिना शल्य  चिकित्सा के दूर हो गया ।।

निराशा


रात की कालिमा गहराने लगी है

मेरे ख्यालों से बास आने लगी है

चटख आबनूसी सा  एक साया

मेरे एहसासों मे अब छाने लगा है


नींद  तो आती नही है कमबख्त 

तिमिर यहाँ छाया रहता हरवक्त

दर्द न फना होता है न मिटता है  

बनकर नासूर सा देह मे रिसता है 


इंतजार की चंद घड़ियाँ है साकी

टूटा पैमाना हूँ बिखरना है बाकी

जो वक्त साथ बिताया ऐ जिन्दगी

वह अब मेरा साथ नहीं दे पायेगा




शरद कुमार श्रीवास्तव