शुक्रवार, 29 दिसंबर 2017

जिन्दगी


मेरी  जिन्दगी मुझसे यूं दामन न छुड़ा
पहलू मे मेरे बैठ जरा मेरे पास तो आ
तू हसीं है जवां दिलो की  चाहत है
पर तुझसे मेरे दिल को भी राहत है

जिन्दगी जीने की  तमन्ना  कम न होगी
मौत की चौखट पे भी यह कम न होगी
कभी कम कभी एकदम गायब होती ये
फिर यकायक रूबरू हो जाती जिन्दगी

जिन्दगी  पाने की इच्छा जगी फिर दिल मे
 फिर और  जीने  की चाहत  जगी दिल मे
आरजू  है जिन्दगी  से यूं  दामन  न छुड़ा
पहलू मे मेरे  बैठ जरा मेरे  पास तो आ

शरद कुमार  श्रीवास्तव 

शनिवार, 2 दिसंबर 2017

ओ बन्धु रे कुछ तो बोल


ओ बन्धु रे कुछ तो बोल
अपनी मन की गाठें खोल
डरा डरा  क्यों तू है बोल
ओ बन्धु रे कुछ तो बोल

दिग दिगान्त शान्त हुए
तू क्यों है दिग्भ्रांत प्रिये
समय की महिमा महान
यह काल बड़ा  बलवान

शाम गभीर बदली छाई
जाने रात कब घिर आई
रात होगी तो दिन होगा
यह बस तू मन में तोल

नवदिन का आगाज कर
नहीं रात से अब तू डर
ओढ़ के सो सपने प्यारे
स्वर्णिम से स्निग्ध न्यारे

अब बन्धु कुछ तो बोल
अपनी मन की गाठें खोल
डरा डरा  क्यों तू है बोल
ओ बन्धु रे कुछ तो बोल






हम साथ चले,  हम गले  मिले, कहने  को  जमाने बीत गये
एक साथ थाली मे खाए  पल, जीवन के सफर में  बीत गये

साथ साथ साइकिलों मे रेस लगाते कालेज  जाते हम दोनों
साथ साथ  घर  में भी खेलते-पढते हुए  जमाने बीत गये

समय के नेपथ्य  मे, लोग हुए वीराने, तुम क्यों रूठ गये
कालेज शहर मोहल्ले जाने क्या क्या हमसे देखो छूट गये
बहुत खोया बहुत था पाया यादे गुजरी रातो को  लूट गये
चौदह वर्ष  बहुत होते हैं  जब तुम हम सबसे थे रूठ गये

शरद कुमार  श्रीवास्तव