रविवार, 26 मार्च 2017



प्रेमपत्र

प्रेमपत्र लिख भेज  रहा हूँ  
प्रिये अगर स्वीकार हो
मेरे कहने की बात नहीं 
तुमको भी गर प्यार हो 

जल्दबाजी की बात नहीं 
फूलों को रखो फुर्सत से 
दिल गर बेकाबू भी हो तो 
इकरार करो जी फुर्सत से

मत देखो तुम मेरी काया
न लट न बिखरे केशों को
मन मैंने सोने सा बनाया
न देखो मेरे आवेशों को

तुमको भी हो मुझको  भी
तब तो फिर  इनकार नहीं 
मत कह देना मुझसे तुमतो
मुझ को तुमसे  प्यार  नहीं 

शरद कुमार  श्रीवास्तव

शुक्रवार, 3 मार्च 2017

झटका भला

झटका  भला

ठहरे पानी सा जीवन  
ऊबने लगा है ये मन
कतार में खड़ा हुआ
हलाल  होने  के  लिए
निरीह  पशु के  जैसा
व्यर्थ  पुकार  लगाता
नकेल 'समय' के  पास
रेतना कब शुरू करेगा
कुछ पता नही चलेगा
सलीब पर पूछी जाती
अंतिम इच्छा कैदी की
 यहाँ नहीं!  न दया ही
धार दार छूरी आहिस्ता
आहिस्ता ही फिरती रहेगी
वक्त  के  साथ! झटका  भला  



बुधवार, 1 मार्च 2017

बासंती सुबह


ऊषा  की नई किरण लेके
बसंत का मौसम  आया
नव प्रभात के स्वागत से
दृग तृप्त हुए मन हर्षाया
 विलुप्त हो गई सारी  धुंध
पतझड़ का क्षण बीत गया
ऊषा की किरणें  आने से
रात्रि  प्रहर अब बीत गया

झांकते नव पल्लव तरु से
देख उन्हें मेरा मन हर्षाया
कोमल कोपलें सजी धजी
देख विटप मन शरमाया

तृण शिखरों पे चमक रहे
हैं हीरक कण शुभ्र-धवल
सुरभित मंद हवा बह रही
थिरकती कलिकाएं नवल

फैला हुआ है कलियों का
सौंदर्य, ये बसंत है आली
बह रही हवा दिगंतों तक
मधुर मदिर मादक वाली

हैं पत्ते भी पेडों पे झूम रहे
पा झोंके मस्त हवाओं के
निर्मल आकाश बिछा हुआ
स्वागत नई फिजाओं के

पिक सुक कोकिला भी तो
वृक्ष पे मधुर गीत सुनाते हैं
मधुमास के  सब रंगों  में
निज सुन्दर रंग  मिलाते हैं


शरद  कुमार  श्रीवास्तव