बुधवार, 18 जनवरी 2017

आज की  गजल 
गजल के लिये  इक हंसीं तस्वीर होना चाहिए  
तासीर भी अच्छी गजल की यह जरूरी  नहीं 
गजल मामूल भी हो तो  चल जाएगी  जरूर 
 बशर्ते तस्वीर में हसीना शोख होना  चाहिये 

ये जमाना और है, फेसबुक वाट्सअप का दौर है
चल नहीं सकती कोई इबारत गौर होना चाहिये 
लिख सकते तो लिखो किताबों मे बेशक लिखो 
पढ़ने के लिये फरिश्ते भी तो और होना चाहिये 

शरद कुमार  श्रीवास्तव 

नींद
नींद  मुझको  आ रही  उसको नमन
खलिश घटती  जा रही  उसको नमन
यादों का जलजला  था उसको नमन
लगातार सिलसिला था उसको नमन

बदलती हुई करवटें थीं  उनको नमन
बिस्तर पे पड़ी सिलवटें  उनको नमन
ऐ मेरे एकाकीपन अब तुमको  नमन
नींद  मुझको  आ रही उसको नमन

पड गई  जो नींद मुझको न जगाना
भूली बिसरी यादों  मेरे पास न आना
बमशक्कत पड़ी है  नींद उसको नमन
घट रही  है अब खलिश उसको नमन



धुंध 

धुंध  कहो या
चाहे कुछ  और  ही
इसके  लिये

आखों  की  जोत
को लगा  है  ग्रहण
दीखता  कम

उम्र  के नाम
यह धुंधलापन
हल्की हैं  छबि

रास्ते  के  लिए
चश्मा और छड़ी  भी
रोड के  कुत्ते

घर में एक
ऐनक लगाये हैं
पढ़ने  हेतु

लेकिन  मुझे
साफ दिखाई  देती
तेरी  प्रतिमा

या आने वाला
घनघोर अंधेरा
सन्निकट ही

भूली बिसरी
यादों  के चेहरे  भी
इन्हीं  आँखों  से  

शरद  कुमार  श्रीवास्तव