रविवार, 31 मई 2020





कोरोना को ललकार

घर में झरोखों से भी दूर है
एक अन्तहीन पसरा सन्नाटा
इसी मे तुझसे भिड़ने
यह बिसात मैंने
खुद ही बिछाई है


अकेलेपन के स्वाद
को खूब चखा है मैंने
सबके बीच एकाकी
रह कर
अनुभव किया है इस
सुख को----


आखिर कैलाश में
एकांत वास मे लिप्त
भगवान शिव भी
एकाकीपन के स्वर
को पहचानते हैं

गहरे गभीर समुद्र
के मध्य एकांत की
अनंत लय मे लीन
भगवान विष्णु भी
लहरों मे अविचल हैं
आत्मविभोर

हमारा एकांतवास
है कोरोना को ललकार
बाहर वह भीतर हम
जब तक हम घर में
तब तक संपूर्ण सुरक्षित



शरद कुमार श्रीवास्तव