रविवार, 29 मार्च 2020

तुमको पैगाम



कोशिशों बाद न बिसरी तमाम  बातें
तुम्हारे इन्तजार में सूनी तमाम रातें
रातों ने बिछाई शतरंज की बिसातें
जीत लीं मुझसे वो नींद की सौगातें

छेड़ता हूँ तसव्वुर का तार जब शब
उनींदा ख्वाब के स्वर इठलाते हैं तब
स्याह सी बदनुमा लकीर खींच कर
दिल के गुलशन में खार बो जाते हैं


मुद्दतों बाद जब सोने की बारी आई है
सर्द पड़ी चादर मौसम की रुसवाई है
इल्तिजा तुमसे तन्हाइयों रुखसत न होना
तुमसे आबाद अब इस दिल का हर कोना

बड़ी तरतीब बड़ी शिद्दत से संजोया इसको
खुशनुमा यादों की माला मे पिरोया इसको
जिसे कहते हैं पैगाम तुझ तलक भेज पाता
झिलमिल सितारो मे पता गर चे मिल जाता


शरद  कुमार  श्रीवास्तव

महालय के सुर



आज फिर नया गीत गुनगुनाओ
नये सुरों के साथ परचम लहराओ
शाम से रागिनी गा रही है तराना
हो सके इधर जरा तुम आ जाना

हवाओं की खुशबू तुम्हारे लिये है
हमारी जुस्तजू बस तुम्हारे लिये है
अखियोंं का कजरा तुम्हारे लिये है
वस्त्र श्रृंगार सब ये तुम्हारे लिए है


तेरे  लिये  रची जा रही है कहानी
वयइति संधि की है सुन्दर जवानी
कलम की नोक बनी है सेन्दुरदानी
वरमाल संग आ महालय की रानी


शरद कुमार श्रीवास्तव





शनिवार, 28 मार्च 2020

मेरी ताजातरीन रचना विक्षोभ



बोलो बोलो हे कंत आया कैसा यह बसंत
विक्षोभ भरा मन मे खुशियों का हुआ अंत
शीत खत्म हुआ बीते शिशिर शरद हेमंत
तुम्हारे बिन हे कंत कैसा लगता ये बसंत

पुष्पों संग अनंग आए हैं संग तुम नहीं आये
फिजा में छाई है मस्ती, सभी पेड़ हैं बौराए
जवाँ हुईं कलियाँ कोकिल की कूक भी आई
हमे घरों में बंद रहना यह कैसी है ऋतु आई

बोलो बोलो हे कंत आया कैसा यह बसंत
विक्षोभ भरा मन मे खुशियों का हुआ अंत
तुम्हारे बिन हे कंत कैसा लगता ये बसंत

चाहत थी हमारी तुम्हारे साथ साथ हम चलते
कभी कहते अपनी बीती  कुछ मेरी सुन जाते
इस कहने सुनने में रातो- दिन साथ कट जाते
न आता कोरोना का खौफ तो जरूर तुम आते

बोलो बोलो हे कंत आया कैसा यह बसंत
विक्षोभ भरा मन मे खुशियों का हुआ अंत
तुम्हारे बिन हे कंत कैसा लगता ये बसंत

शरद कुमार श्रीवास्तव