शनिवार, 28 मार्च 2020

मेरी ताजातरीन रचना विक्षोभ



बोलो बोलो हे कंत आया कैसा यह बसंत
विक्षोभ भरा मन मे खुशियों का हुआ अंत
शीत खत्म हुआ बीते शिशिर शरद हेमंत
तुम्हारे बिन हे कंत कैसा लगता ये बसंत

पुष्पों संग अनंग आए हैं संग तुम नहीं आये
फिजा में छाई है मस्ती, सभी पेड़ हैं बौराए
जवाँ हुईं कलियाँ कोकिल की कूक भी आई
हमे घरों में बंद रहना यह कैसी है ऋतु आई

बोलो बोलो हे कंत आया कैसा यह बसंत
विक्षोभ भरा मन मे खुशियों का हुआ अंत
तुम्हारे बिन हे कंत कैसा लगता ये बसंत

चाहत थी हमारी तुम्हारे साथ साथ हम चलते
कभी कहते अपनी बीती  कुछ मेरी सुन जाते
इस कहने सुनने में रातो- दिन साथ कट जाते
न आता कोरोना का खौफ तो जरूर तुम आते

बोलो बोलो हे कंत आया कैसा यह बसंत
विक्षोभ भरा मन मे खुशियों का हुआ अंत
तुम्हारे बिन हे कंत कैसा लगता ये बसंत

शरद कुमार श्रीवास्तव

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