तुम जो मिले, तो मिली मंजिल
तुमसे ही रोशन हुई हर महफिल
तुम्हारे रहने से रौशन थीं दिशाएँ
अब सूझता नहीं हम किधर जाएं
बहके बहके से फिजा के इशारे थे
दूर रहकर भी बेशक तुम हमारे थे
रहते हरपल कभी जान से प्यारे थे
खुशनुमा बाग के हसीन नजारे थे
यह सच है कि मंजिलें और भी हैं
जीने मरने के ठिकाने और भी हैं
सच है प्यार ही सब कुछ नहीं है
उसके सिवा और कुछ भी नहीं है
ये नेमत हर नेमत से बड़ी होती है
नहीं तो दिलों में दरार पड़ी होती है
हर सोंच गर प्यार पर सिमट जाए
सच मानो सारे फसाद मिट जाय
शरद कुमार श्रीवास्तव
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