मंगलवार, 22 नवंबर 2022

कहीं कमी कुछ जरूर है

जिन्दगी तो लाजवाब  है

भरे पूरे सब असबाब  है

वैभव हरियाली भरपूर है

पर कमी कुछ जरूर है


एकाकी न रहने देता कोई 

गूंजों से रंगीं महफिलें मेरी

शोरों को लब्ध हरेक नूर है

पर कहीं कमी कुछ जरूर है


सबेरे सूरज निकलता है

दिनकर स्वतः चलता है

क्रमबद्ध रातें मे भी सरूर है

पर कहीं कमी कुछ जरूर है


जिन्दगी का मोह सबको है

तो यह मोह भरा मुझको भी

उम्रदराज हाजिरी अब बेनूर है 

हाँ कहीं कमी कुछ जरूर  है


शरद कुमार श्रीवास्तव 



गुरुवार, 9 जून 2022

कुछ हाइकु

 

कुछ हाइकु


कड़ी धूप मे

ठंडा कूल आभास-

धूप का चश्मा


हमसफर

छायादार वृक्ष हैं

श्वेत गगन 


झरोखे मे बैठ 

निहारती सुन्दरी

अमलतास 


लाठी पकड़े

निस्तेज वृद्ध तन

लम्बी छलांग 







शरद कुमार श्रीवास्तव

जय केदारनाथ

 देवलोक की कन्दरा मे ठिठुर रही थी रात

घाटी को चीर उगा दिन वहीं अकस्मात।। 

उत्तुंग शीश पर शोभित विराट रजत किरीट 

क्षण को भर लूँ उर मे मैं, पल जा रहा है बीत।।

होड़ लगाई मेघों ने भी छेड़ दिया अनुराग 

उसकी भी सुन तो लो मचा दिया शिशुराग।।

द्रवित  हुआ नभ एकदम बरसी सभी दिशाएं

थमी बदन की ताप प्रणाली कंपित हुईं शिराएं।।

 आग तापते छाते और चिलम संग अधनंगे संत

भक्तो की लम्बी कतार का कहीं न मिलता  अंत

जय केदार- जय केदार कंठनाद अप्रतिम उद्घोष 

प्रभु दर्शन करने जाने का रहा सभी जनो मे जोश

नभ मे ईश मानस मे ईश्वर परिवेश सदा से ईश्वर मय

केदारनाथ ही है परमपिता देवलोक सदा परमेश्वर मय


शरद कुमार श्रीवास्तव 



शरद कुमार श्रीवास्तव 






सरिता का जल

 नभ जल कलकल हिम जल कलकल

 गिरि से अवरोहित कलकल छलछल 

नवयौवना सरिता की अल्हड़  कलकल

गिरि से उतर रही वेग भरी चंचल चंचल।।


मस्ती है इसका महामंत्र हरपल प्रतिपल

मस्ती ही परिसीमन बस चलती कलकल

राहें हों टेढी तिरछी हों बाधा से भले  बिछी

जंगल नगर है राग एक मृदु मंगल छलछल ।।


बहता जल है  केवल निर्मल, रुकेजरा तो दूषित  जल

संदेश  दे रही मानव जन को, बढ़ो सदा विमल विमल 

रुको नहीं बस चले चलो चाहे  कितनी भी बाधा हो

सलिला देती संदेश सदा मधुर राग  कलकल छलछल 


शरद कुमार श्रीवास्तव 


रविवार, 5 जून 2022

एक वृक्ष बस

 जेठ की दुपहरी मे

ठांव दे रहा बटवृक्ष

दिन मे शीतल छांव

और सांसो को सांस


शाखाओ को बिखेरे

स्वागत  करता हर पल 

बटोही तनिक  ठहर तू

विश्राम  कर फिर जाना


मै बादलो को रोक रहा 

खड़ा अकेला एकाकी

मानव की पिपाषा मे

कट रहे वृक्ष पर वृक्ष 


तुम एक  वृक्ष लगाओगे

धरा की प्यास  बुझाओगे

प्रश्न है पर जटिल  नहीं

एक संकल्प  करो बस


शरद कुमार श्रीवास्तव 




शनिवार, 5 फ़रवरी 2022

बसन्त पंचमी शरद कुमार श्रीवास्तव



बसन्त पंचमी त्योहार आया
बच्चो मे यह खुशियाँ लाया
चीबू भैया पहने शर्ट बसंती
माला दी की है फ्रॉक बसंती

सरस्वती पूजा संग ले आया
बसन्त पंचमी का वार आया
कालेज और स्कूलो मे आया
बच्चो मे ये उल्लास ले लाया

बच्चे तो हुलसित घूम रहे हैं
नाच थिरक और झूम रहे है
हाथ मे लिये प्रसाद के दोने
मजे मे घूमे शहर के हर कोने



शरद कुमार श्रीवास्तव 

बुधवार, 19 जनवरी 2022

 नींद 


बेइंतिहा आती हुई मेरी नींद को नमन

घटती हुई उम्र मे यादें खोने को नमन

खलिश है ताउम्र मैने क्या खोया पाया

इस उम्र मे होता है उस होने को नमन


बदलती करवटें कहतीं अंतहीन कथा

सिलवटें कहती बढते उम्र की व्यथा

ख्वाब ले आये हैं मुझे बिसरी याद मे

नींद का शुक्रिया बस उसी को नमन


पड गई  जो नींद मुझको न जगाना

बिसरी यादों को कैनवस से न हटाना 

बामशक्कत पड़ी है  नींद उसको नमन

घट रही  है अब खलिश उसको नमन


शरद  कुमार  श्रीवास्तव