जेठ की दुपहरी मे
ठांव दे रहा बटवृक्ष
दिन मे शीतल छांव
और सांसो को सांस
शाखाओ को बिखेरे
स्वागत करता हर पल
बटोही तनिक ठहर तू
विश्राम कर फिर जाना
मै बादलो को रोक रहा
खड़ा अकेला एकाकी
मानव की पिपाषा मे
कट रहे वृक्ष पर वृक्ष
तुम एक वृक्ष लगाओगे
धरा की प्यास बुझाओगे
प्रश्न है पर जटिल नहीं
एक संकल्प करो बस
शरद कुमार श्रीवास्तव
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