गुरुवार, 9 जून 2022

जय केदारनाथ

 देवलोक की कन्दरा मे ठिठुर रही थी रात

घाटी को चीर उगा दिन वहीं अकस्मात।। 

उत्तुंग शीश पर शोभित विराट रजत किरीट 

क्षण को भर लूँ उर मे मैं, पल जा रहा है बीत।।

होड़ लगाई मेघों ने भी छेड़ दिया अनुराग 

उसकी भी सुन तो लो मचा दिया शिशुराग।।

द्रवित  हुआ नभ एकदम बरसी सभी दिशाएं

थमी बदन की ताप प्रणाली कंपित हुईं शिराएं।।

 आग तापते छाते और चिलम संग अधनंगे संत

भक्तो की लम्बी कतार का कहीं न मिलता  अंत

जय केदार- जय केदार कंठनाद अप्रतिम उद्घोष 

प्रभु दर्शन करने जाने का रहा सभी जनो मे जोश

नभ मे ईश मानस मे ईश्वर परिवेश सदा से ईश्वर मय

केदारनाथ ही है परमपिता देवलोक सदा परमेश्वर मय


शरद कुमार श्रीवास्तव 



शरद कुमार श्रीवास्तव 






कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें