नभ जल कलकल हिम जल कलकल
गिरि से अवरोहित कलकल छलछल
नवयौवना सरिता की अल्हड़ कलकल
गिरि से उतर रही वेग भरी चंचल चंचल।।
मस्ती है इसका महामंत्र हरपल प्रतिपल
मस्ती ही परिसीमन बस चलती कलकल
राहें हों टेढी तिरछी हों बाधा से भले बिछी
जंगल नगर है राग एक मृदु मंगल छलछल ।।
बहता जल है केवल निर्मल, रुकेजरा तो दूषित जल
संदेश दे रही मानव जन को, बढ़ो सदा विमल विमल
रुको नहीं बस चले चलो चाहे कितनी भी बाधा हो
सलिला देती संदेश सदा मधुर राग कलकल छलछल
शरद कुमार श्रीवास्तव
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