यादों के मेरे इस शहर मे एक घर सिर्फ तेरा ही है।
मेरी दास्ताने इश्क मे चर्चा भी सिर्फ तेरा ही है ।।
कोई आये या न आए इस वीरान पड़े गुलशन मे
ठूठों मे भला कोई गुल क्या कभी परचम होगा ।।
बात यादों की नहीं है न उनकी बारात का जिक्र
ख्याल खुद- ब खुद सिलसिलेवार चले आते हैं।।
जैसे कल ही की बात हो या अभी बीते पल की
तसव्वुर फुसलाकर ले जाते हैं भूले सुहाने मंजर।।
ऐहसास पसरी हुई तन्हाई का न होता मुझको
काली स्याह रातें ही जुल्फों मे भर लेती मुझको ।।
फिक्र करना नहीं कभी न मेरा जिक्र ही करना
रेत के टीले कभी सब्ज बाग संजो पाये हैं भला।।
शरद कुमार श्रीवास्तव