गुरुवार, 7 मई 2026

अनसुनी और कान की मशीन

 तूने कुछ कहा, क्या  कहा ,जो रहा अनसुना

मैने नहीं सुना, जो भी सुना, वो रहा अनसुना

तूने तो कहा फुसफुसा के कहा रहा अनसुना 

कुछ मुस्कराके, सिर हिलाके, सुना  झुनझुना।।


कुछ  नया हो सुनू अपने कान की रुई हटा के

सुनू मैं गर जरूरी,  कान की मशीन  लगा के

फ्रेश  सेल्स भी  कान की मशीन मे डलवा के

अता-पता  या सिला हो, तो जहमत उठाके ।।


बातें तो रही पुरानी, हो रही, आगे भी आनी।

नानी की कहानी, मम्मी की जुबानी सुनी सी

अब क्या सुनू सिर को खपा के ध्यान लगाके

अता पता कोई सिला हो तो बाकी सब बेकार 


नहीं सुनना मेरे यार कान की मशीन लगाकर 



शरद कुमार  श्रीवास्तव 

अवधी मे आधुनिक निर्गुण

 संझा है सुरभित हमार

भली फूलन से सब डार


बच्चन के बच्चा लगे कारोबार 

सुख के झूला पे लेइत हिलार

संझा है सुरभित हमार

भली फूलन से सब डार


कौनो बात केर चिन्ता नही है

जउन निकर जइबे सागर पार

संझा है सुरभित हमार


दया धरम के अच्छे करम के

 इहै है  नतिजवा

राम  दिहिन हमका उपहार

भली फूलन से सब डार


संझा है सुरभित हमार

भली फूलन से सब डार






पतझड़ काल

जीवन मे शुष्क हवाएं लिए मौसम 

मुस्कान संजोए चेहरे कहीं दर्द  है

छुपाते हो क्या सब की है कहानी

कभी दुख तो फिर  सुख भी आनी



रात अंधेरी  या चंदेरी रोशनी रही फूट

बाँह हो साथी की अतिशय सुख  लूट 

पत्ते पेड़ों से झड़ रहे खड़- खड़ अनन्त 

गर जीवन का सत्य है तो आने को बसंत 


जामुन महुआ टेसू फूलेंगे और रसाल

कोयल पिक फिर कूकेंगे नाचेगे मराल 

शुष्क  हवाएं हैं अभी जीवन  का सत्य

गुजरेगा यह पल भी अब आएगा बसंत। ।


शरद कुमार श्रीवास्तव 

मंगलवार, 5 मई 2026

मौसम जेष्ठ का

 कुछ गरम गरम कुछ शीत शीत

थोड़ा गुस्सा फिर भी  प्रीत प्रीत

ऐसा कुछ मिज़ाज मौसम का भी

एयर कंडीशनर मे लगे शीत शीत 


कोपल पेड़ों मे फूटे कुदरत की रीत

नूतन किसलय, श्यामा के नये गीत

जामुन आम फूल फल नित नवीत 

अमलतास से पुष्प बर्षा पीत पीत


कुछ अन्न अभी खेतों खलियानो मे

कुछ पड़े हुए अभी भी मैदानो ही मे 

हिम पिघल रही है हिम फिसल  रही 

लू बयार तो बेमौसम वर्षा बिफर रही


निर्झर पर्वत , पंछी मस्त बागवानों मे 

गर्मी का प्रतिदिन प्रकोप मैदानों मे 

श्रम उद्यम के माथे पे बहती जलधारा

तपती घूप मे बटोही चले रुके थमथम


 इस मौसम की कथा ही  निराली है

उपलों मे हिमवर्षा पृथ्वी पर बवाली है

जेष्ठ माह की अभी शुरुआत हुई है  

गर्मी का प्रकोप न रुकता एक क्षण 


शरद कुमार  श्रीवास्तव 



मंगलवार, 16 दिसंबर 2025

यादों का सिलसिला

यादों के मेरे इस शहर मे एक घर सिर्फ तेरा ही है।
मेरी दास्ताने इश्क मे चर्चा भी सिर्फ तेरा ही है ।।
कोई आये या न आए इस वीरान पड़े गुलशन मे  
ठूठों मे भला कोई गुल क्या कभी परचम होगा ।।

बात यादों की नहीं है न उनकी बारात का जिक्र 
ख्याल खुद- ब खुद  सिलसिलेवार चले आते हैं।।
जैसे कल ही की बात हो या अभी बीते पल की
तसव्वुर फुसलाकर ले जाते हैं भूले सुहाने मंजर।।

ऐहसास पसरी हुई तन्हाई  का न होता मुझको
काली स्याह रातें ही जुल्फों मे भर लेती मुझको ।।
फिक्र  करना नहीं कभी न मेरा जिक्र ही करना
रेत के टीले कभी सब्ज बाग संजो पाये हैं भला।।

शरद कुमार श्रीवास्तव

मंगलवार, 4 मार्च 2025

लक्ष्य भेद

 लक्ष्य को भेदित नित

दैनिक अभ्यास 

इच्छा, नई ऊंचाइंया ।

नया परिसीमन 

नया लक्ष्य फिर  बोरियत  

असीमित,   अलक्षित ।।

घर के कमरों 

की सीमांत  लकीरें

पसरी अजगर सी। 

इधर से उधर

उधर  से इधर

इसी परिसीमन मे ।

किसने खींचीं है 

लकीरें अभेद्य 

लक्ष्मण  रेखा ।।

और मेरा भी   

बाहर निकलने का

न इरादा न विचार ।

मन मे सिमटा भयानक 

आवारा पशुओं सा भय

और सामने ढलती  जिन्दगी ।।


शरद कुमार श्रीवास्तव 

 


शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2025

बसन्त के स्वागत मे

 


अलि तुम आली से कहना अब बसन्त आने को है

चहकने लगी हैं कलियाँ  भ्रमर दल लहराने को है

हवा मे अब गुलाबी ठंड , फिजा भी मस्त  मस्त है।

पीली सरसों की खुश्बुओं से मौसम लब्ध लस्त है ।।


तरु पर नूतन किसलय नई कोपलें फूटने को हैं

शिशिर के अति आतंक से जगत अब छूटने को है

पर्वत  पिघलने लगे शिखर नदियों का कलकल मनोहर है

धरती भर मे गूंजता आसन्न चैती का सुन्दर  सोहर है ।।



ऋतुराज आने के आगाज से, जामुन आम बौराया

तितलियों मवरों के दलों ने आगमन का प्रीतराग गाया

इधर हाला उधर टेसू पलाश  होली का  रंग मदमाता

लगा अब कोयल पिक पक्षीजन स्वागत  गीत  स्वर मे गाता ।।

शरद कुमार श्रीवास्तव