मंगलवार, 4 मार्च 2025

लक्ष्य भेद

 लक्ष्य को भेदित नित

दैनिक अभ्यास 

इच्छा, नई ऊंचाइंया ।

नया परिसीमन 

नया लक्ष्य फिर  बोरियत  

असीमित,   अलक्षित ।।

घर के कमरों 

की सीमांत  लकीरें

पसरी अजगर सी। 

इधर से उधर

उधर  से इधर

इसी परिसीमन मे ।

किसने खींचीं है 

लकीरें अभेद्य 

लक्ष्मण  रेखा ।।

और मेरा भी   

बाहर निकलने का

न इरादा न विचार ।

मन मे सिमटा भयानक 

आवारा पशुओं सा भय

और सामने ढलती  जिन्दगी ।।


शरद कुमार श्रीवास्तव 

 


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