नींद
बेइंतिहा आती हुई मेरी नींद को नमन
घटती हुई उम्र मे यादें खोने को नमन
खलिश है ताउम्र मैने क्या खोया पाया
इस उम्र मे होता है उस होने को नमन
बदलती करवटें कहतीं अंतहीन कथा
सिलवटें कहती बढते उम्र की व्यथा
ख्वाब ले आये हैं मुझे बिसरी याद मे
नींद का शुक्रिया बस उसी को नमन
पड गई जो नींद मुझको न जगाना
बिसरी यादों को कैनवस से न हटाना
बामशक्कत पड़ी है नींद उसको नमन
घट रही है अब खलिश उसको नमन
शरद कुमार श्रीवास्तव
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