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मेरे उर मे
तैरता अनंत सा
एक शब्द
अनेक शब्द
भावों मे डूब कर
गति पा चुके
ये एकाकी ही
तैर रहा उर मे
अनुत्तरित
उससे पूछा
मेरे अकथ शब्द
अभी हो यहीं
यक्ष की भाँति
तुम वहीं के वहीं
अनसुने से
मेरे सपने
पानी पे रेखा से
अव्यक्त बने
शरद कुमार श्रीवास्तव
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