धुंध
धुंध कहो या
चाहे कुछ और ही
इसके लिये
आखों की जोत
को लगा है ग्रहण
दीखता कम
उम्र के नाम
यह धुंधलापन
हल्की हैं छबि
रास्ते के लिए
चश्मा और छड़ी भी
रोड के कुत्ते
घर में एक
ऐनक लगाये हैं
पढ़ने हेतु
लेकिन मुझे
साफ दिखाई देती
तेरी प्रतिमा
या आने वाला
घनघोर अंधेरा
सन्निकट ही
भूली बिसरी
यादों के चेहरे भी
इन्हीं आँखों से
शरद कुमार श्रीवास्तव
धुंध कहो या
चाहे कुछ और ही
इसके लिये
आखों की जोत
को लगा है ग्रहण
दीखता कम
उम्र के नाम
यह धुंधलापन
हल्की हैं छबि
रास्ते के लिए
चश्मा और छड़ी भी
रोड के कुत्ते
घर में एक
ऐनक लगाये हैं
पढ़ने हेतु
लेकिन मुझे
साफ दिखाई देती
तेरी प्रतिमा
या आने वाला
घनघोर अंधेरा
सन्निकट ही
भूली बिसरी
यादों के चेहरे भी
इन्हीं आँखों से
शरद कुमार श्रीवास्तव
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें