बुधवार, 18 जनवरी 2017

धुंध 

धुंध  कहो या
चाहे कुछ  और  ही
इसके  लिये

आखों  की  जोत
को लगा  है  ग्रहण
दीखता  कम

उम्र  के नाम
यह धुंधलापन
हल्की हैं  छबि

रास्ते  के  लिए
चश्मा और छड़ी  भी
रोड के  कुत्ते

घर में एक
ऐनक लगाये हैं
पढ़ने  हेतु

लेकिन  मुझे
साफ दिखाई  देती
तेरी  प्रतिमा

या आने वाला
घनघोर अंधेरा
सन्निकट ही

भूली बिसरी
यादों  के चेहरे  भी
इन्हीं  आँखों  से  

शरद  कुमार  श्रीवास्तव

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें